Saturday, October 31, 2020

विंध्यवासियों को विंध्यप्रदेश राज्य वापस किया जाये

 विंध्यवासियों को विंध्यप्रदेश राज्य वापस किया जाये 



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आज के दिन ही 1 नवंबर 1956 को विंध्यप्रदेश राज्य का विलीनीकरण मध्यप्रदेश मे कर विंध्यवासियों के साथ कुठाराघात किया गया था । विंध्यभारती परिषद् के संयोजक हरिहर प्रसाद तिवारी ने कहा कि विंध्यप्रदेश विंध्य वासियों का है।

  विंध्यप्रदेश राज्य की वापसी विंध्यवासियों का नैतिक अधिकार है । देश की आजादी के बाद लगभग 4 वर्षों तक विंध्य प्रदेश राज्य अस्तित्व में रहा ,और उस दौरान विंध्य के विकास की आधारशिला रखी गयी ,परंतु राजनैतिक षडयंत्रों के तहत अकारण विंध्य प्रदेश राज्य का विलय 1-11-1956 को मध्यप्रदेश राज्य में कर दिया गया । इस विलीनीकरण के दुष्परिणाम और अपमान का दंश विंध्य वासी लगभग 65वर्षों से झेल रहे हैं।  विंध्य प्रदेश राज्य वापसी के लिए  मार्च 2000 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होकर केन्द्र सरकार को भेजा गया था , लेकिन उक्त प्रस्ताव को राजनैतिक द्वेश भावना के कारण  संभवतः कूड़ेदान में फेंक दिया गया। जबकि छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना जैसे राज्य पूर्णतः अस्तित्व में आ गये और विकास कार्यो को उंचाइयों तक पहुँचा रहे हैं। 

          हम विंध्यवासियों का विंध्य प्रदेश हमसे छीन लिया गया और हम दूसरे का मुंह निहारते उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। जबकि विंध्य क्षेत्रफल के दृष्टि से बृहद, राजस्व प्राप्ति के मामले में समृद्ध, प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संसाधानो का विपुल भंडार है। पर्याप्त उद्योग धंधे है, शिक्षा के समुचित विस्तार के अवसर है। विंध्य के आय से मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्र में विकास कार्य हो रहे हैं, जबकि विंध्यांचल के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है, जिसके कारण विंध्य क्षेत्र विकास के मामले अपेक्षाकृत बहुत पीछे है। 

     

                   आदरणीय हरिहर प्रसाद तिवारी जी


    

विंध्य भारती परिषद् के संयोजक हरिहर प्रसाद तिवारी ने कहा कि  विंध्यप्रदेश का विलय मध्यप्रदेश मे करना विंध्यवासियों के साथ घोर अन्याय था,अब यह अन्याय विंध्य वासी और बर्दास्त नही करेंगे , विंध्यभारती परिषद् के संयोजक हरिहर तिवारी ने कहा कि विंध्यप्रदेश वापसी के लिये हस्ताक्षर अभियान विग वर्ष 2018 से चलाया जा रहा है, अब तक रीवा,सतना सीधी अनूपपुर, शहडोल जिले के लगभग एक लाख लोगों के हस्ताक्षर प्राप्त हो चुके हैं अभी यह जागरूकता अभियान निरंतर गति पर है ।हरिहर प्रसाद तिवारी ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि अब विंध्यांचल को मध्यप्रदेश से पृथक कर मार्च 2000 में पारित विधानसभा प्रस्ताव पर समुचित निर्णय ले तथा  विंध्यप्रदेश राज्य विंध्यवासियों को वापस करें ।


 विंध्य प्रदेश राज्य, विंध्यवासियों की सशक्त आवाज है। खास वजह है कि विंध्यप्रदेश राज्य के बिलीनीकरण के 65 साल हो गये आज भी सबसे अधिक गरीबी,भुखमरी और कुपोषण पूर्व विन्ध्य प्रदेश क्षेत्र में है।सबसे अधिक पलायन भी विन्ध्यांचल से ही है, विन्ध्य के अधिकांशं इलाके में सिंचाई और पीने के पानी का संकट है।मध्यप्रदेश में  मध्य भारत, महाकौशल, भोपाल और तत्कालीन  विन्ध्य प्रदेश का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो सबसे अविकसित क्षेत्र विन्ध्य प्रदेश ही है।यह मांग राजनीतिक नहीं है।इस क्षेत्र का विकास बिना राज्य बने संभव ही नहीं है।



-पंडित पंकज द्विवेदी , संचालक ब्लॉग

Vindhya pradesh the land of white tiger

Saturday, October 24, 2020

माँ बिरासिनी देवी की जो मन से भक्ति करता है उसकी मनोकामना मईया पूरी करती है




10वी शताब्दी में कलचुरी काल के राजा वीर सिंह ने मंदिर का निर्माण किया था। विंध्य क्षेत्र के उमरिया जिले में स्थित बिरसिंहपुर पाली में माँ बिरासिनी देवी का भव्य मंदिर स्थापित है।


नवरात्रि के पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा हुआ है। माँ की भव्य आरती देख सुन कर ही चित्त में आत्म शुद्धि का अनुभव होता है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से मां की भक्ति करता है उसकी मनोकामना मैय्या पूरी करती हैं। माँ अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं।

बिरासिनी माता मंदिर बीरसिंहपुर  पाली | birasini mata mandir birsinghpur pali-

बिरासिनी मंदिर में आदिशक्ति स्वरूपा बिरासिनी माता की  10 वीं सदी की  कल्चुरी कालीन काले पत्थर से निर्मित भव्य मूर्ति विराजमान है | यह  पूरे भारत में  माता  काली की उन गिनी चुनी प्रतिमाओं में से एक है । मंदिर के गर्भ गृह में माता के  पास ही भगवान् हरिहर बिराजमान हैं जो आधे  भगवान्  शिव और आधे  भगवान्   विष्णु के रूप हैं | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं | मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण , मरही माता, भगवान् जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं | मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित  है |माता की  अलौकिक शक्तियों के कारण लोगों की मनोकामनाएं हमेशा पूरी होती हैं और यहां साल भर लोगों की भीड़ रहती है |

                                 


बिरासिनी माता मन्दिर से जुडी मान्यता -

मान्यतानुसार बिरासिनी माता ने सैंकड़ों वर्ष पूर्व पाली निवासी धौकल नामक व्यक्ति को सपना दिया कि उनकी मूर्ति एक खेत में है जिसे लाकर नगर में स्थापित करो | धौकल नामक व्यक्ति ने मूर्ति लाकर एक छोटी सी मढिया बनाकर माता को बिराजमान कराया | बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने एक मंदिर का निर्माण कराकर माता की स्थापना की | 



बिरासिनी माता  मंदिर का पुनर्निर्माण | Rebuilding Of Birasini Mata Temple -

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण का प्रारंभ जगतगुरु शंकराचार्य द्वारका  शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द  सरस्वती जी के पावन करकमलों द्वारा माघ शीर्ष कृष्ण पक्ष गुरुवार विक्रम संवत २०४६ ( दिनांक 23 नवम्बर 1989 ) को किया गया और बीरसिंहपुर कालरी /SECL/सभी दानदाताओं के सहयोग से लगभग सत्ताईस लाख रूपये में माता के संगमरमर के भव्य मंदिर पूर्ण हुआ | मंदिर का वास्तुचित्र , वास्तुकार श्री विनायक हरिदास NBCC नई दिल्ली द्वारा निशुल्क प्रदान किया गया |  बिरासिनी माता देवी मंदिर का जीर्णोद्धार का समापन कार्यक्रम , पुनः प्राण प्रतिष्ठा, कलश शिखर प्रतिष्ठा गुरूवार वैशाख शुक्र सप्तमी संवत् २०५६ (22 अप्रेल 1999 ) जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष से संपन्न हुआ |

माता बिरासिनी देवी के मंदिर परिसर में दो मुख्य प्रवेश द्वार है और एक द्वार पीछे के तरफ है | मंदिर पूरी तरह संगमरमर से निर्मित है | मंदिर के गर्भ गृह में माता बिरसिनी (काली माता)  बिराजमान हैं  | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर भी हैं | मंदिर के बाजू में मुंडन स्थल है | मुंडन स्थल के सामने ज्योति कलश स्थल है जो एक विशाल तलघर रूपी हाल है जिसमें नवरात्र में लोगों द्वारा हजारों घी और तेल के ज्योति कलशों की स्थापना की जाती है | मंदिर परिसर  में ही मंदिर का समिति  कार्यालय , छोटी धर्मशाला  और भण्डारा स्थल है |



नवरात्र और जवारा विसर्जन 

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के  मंदिर में वर्ष में दो बार शारदेय और चैत्र  में नवरात्र पूजा बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है | जिसमें ना केवल आस-पास के लोग अपितु देश-विदेश  से लोग अपनी मनोकामनायें मांगने के लिए आते हैं और मनोकामनायें पूरी होने पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं | नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है | यहां हजारों कि संख्या में घी,तेल और जवारे के कलश स्थापित किये जाते हैं | ज्योति कलश हेतु एक विशाल हाल की व्यवस्था है | जवारे हेतु दो मंजिला व्यवस्था की जाती है | श्रध्दालुओं द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने हेतु मंदिर प्रबंध संचालन समिति द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था की जाती है जिसमेंकोई भी व्यक्ति निश्चित राशि जमा करके घी जवारे कलश, तेल जवारे कलश , मनोकामना कलश,आजीवन घी जवारे कलश ,आजीवन तेल जवारे कलश स्थापित कर सकते हैं  | पूरे नवरात्र में मंदिर परिसर में बच्चो के मुंडन , कर्ण छेदन की व्यवस्था की जाती है | सांथ ही मंदिर समिति और अन्य लोगों द्वारा भण्डारे भी करवाये जाते हैं  और पुरे नौ दिन माता का श्रृंगार , भोग ,पूजा अर्चना बड़े ही श्रध्दा भक्ति से की जाती है | माता बिरासिनी के दरवार सोने-चांदी  के जेवरात सहित लाखो का चढ़ावा चढ़ाया जाता है |

बिरासिनी माता के जवारे विसर्जन बहुत ही प्रसिद्ध है जिसमें हजारों के संख्या  में महिला/पुरुष  जवारे विसर्जन में सम्मिलित होते हैं |


2 मंजिल में बोई जाती है ज्वार

जवारों और प्राचीन प्रतिमा को लेकर प्रसिद्ध इस मां बिरासिनी मंदिर में इस बार २७ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा सकते हैं। दो मंजिला में जवारों को बोया जाता है। अभी एक मंजिला पूरा जवारों से भर गया है।दूसरे मंजिल में भी जवारे बोने शुरू किया जाएगा। माता बिरासिनी के दरबार मे श्रद्धालुओ द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने के लिए मन्दिर प्रबन्ध संचालन समिति के द्वारा बेहतर व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही मंदिर परिसर में जवारे बोना शुरू कर दिया गया है। भक्तिमय माहौल के बीच जवारों का विसर्जन किया जाता है। इस साल भी १५ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा रहे हैं।


बीरसिंहपुर पाली कैसे पहुंचें | How to Reach Birsinghpur Pali - 

रेल मार्ग -   बीरसिंहपुर पाली बिलासपुर – कटनी ट्रेन रूट पर स्थित है | बीरसिंहपुर पाली स्टेशन से बिरसिनी माता मंदिर की दूरी 1/2 (आधा) किलोमीटर है |

सड़क मार्ग-  बीरसिंहपुर पाली  की सड़क मार्ग से जिला मुख्यालय उमरिया से दूरी- 40 किमी० ,शहडोल से दूरी- 38 किमी० ,नौरोजाबाद से -9 किमी० , डिन्डोरी से 77 किमी० , जबलपुर से 150 किमी० , अमरकंटक और बांधवगढ़ से दूरी क्रमशः 70 किमी० और 144 किमी० है | 

वायु मार्ग- निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर 150 किलोमीटर है |

#विंध्यप्रदेश , #विंध्य , #बिरासिनीमन्दिर 


-✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी, संचालक ब्लॉग
VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER

Tuesday, October 20, 2020

जलजलिया माँ भक्तों की करती है मनोकामना पूरी ,पहाड़ से हुई थी प्रकट




जलजलिया माँ

सिंगरौली के माड़ा में मौजूद है देवी मंदिर, आदिमानव काल से जुड़ा है इतिहास। श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि मध्य प्रदेश के सिंगरौली में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं पर माड़ा की जलजलिया मां की बात ही निराली है।


 श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि मध्य प्रदेश के सिंगरौली में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं पर माड़ा की जलजलिया मां की बात ही निराली है। कहते हैं मां जलजलिया पहाड़ से प्रकट हुई हैं और हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं। इस स्थान को आदि मानवकाल से जोड़कर भी देखा जाता है। सिंगरौली रेलवे स्टेशन से करीब 60 किमी. पर स्थान है।


ऊंचे पहाड़ों हरे-भरे जंगलों से आच्छादित यह स्थान बड़ा ही रमणीय है। माड़ा की आदिमानव काल की गुफाओं की श्रृंखला के बीच मां जलजलिया का मंदिर है। पुजारी बताते हैं मां जलजलिया पहाड़ तोड़कर अवतरित हुई हैं।


निर्मल धारा सदा प्रवाहित

विशाल पहाड़ के नीचे से जल की अविरल निर्मल धारा सदा प्रवाहित होती है। इस जलधारा के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ के नीचे क्षीर सागर है जहां से यह जलधारा आती है। सदियों पहले देवी की मूर्ति स्थापित कर मां जलजलिया के नाम से लोग उपासना करने लगे। धीरे-धीरे मां की कृपा से लोगों के दुख दर्द दूर हुए और यहां आस्था का मेला लगने लगा।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger


पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं

यहां देशभर से श्रृद्धालू मां के दर्शन के लिए आते हैं। मन्नतें रखते हैं। मां को चुनरी भेंट करते हैं। नारियल रेवड़ी का प्रसाद चढ़ाते हैं। माथा टेक मां से आशीर्वाद लेते हैं। इस स्थान को आदिमानव काल से जोड़ कर देखा जाता है। इसकी वजह माड़ा की गुफाएं हैं। जो आदिमानव काल की हैं। पहाड़ों को काटकर बनाई गई हैं। इन्हीं गुफाओं की श्रृंखला के बीच यह देवी स्थान हैं।


पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही रमणीय स्थल

उसी पहाड़ में है जिसमें माड़ा की 'रावण' गुफा है। इस स्थान की खूबी यह है कि धार्मिक केंद्र तो है ही, पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत रमणीय स्थल है। यहां चहुंओर घनघोर जंगल है। पक्षियों का कलरव सुन आनंद की अनुभूति होती है तो सदानीरा झरने देख मन शीतल हो जाता है। हरी-भरी वादियों के बीच शांति और सुकून मिलता है। इस स्थान तक पहुंचने के लिए बस और आटो मुख्य साधन हैं। बैढऩ बस अड्डे से माड़ा तक बसें चलती हैं तो सिंगरौली रेलवे स्टेशन और बस अड्डे से आटो कर भी जाया जा सकता है।

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शेषनाग करते हैं यहां शिव का जलाभिषेक

वाकई अद्भुत दृश्य है यहां। मां जलजलिया के स्थान से कुछ ही कदम पर शिवलिंग स्थापित है। जिनके ऊपर शेषनाग के फन से जलधारा निरंतर गिरती रहती है अर्थात शेषनाग भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह जलधारा मां जलजलिया के स्थान से निकलकर शेषनाग के शरीर में प्रवेश करती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई पीढिय़ों से सुनते हैं कि यह जलधारा कभी रुकी नहीं। यह चमत्कार सदियों से बरकरार है।

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मकर संक्रांति को जुटता है आस्था का सैलाब

यूं तो हर रोज श्रद्धालू यहां पहुंचते हैं लेकिन मकर संक्रांति को यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालू आते हैं। पुजारी पं. रामानुह बताते है कि इस दिन आस्था चरम पर होती है। यह दिन मां जलजलिया का विशेष दिन है। हवन, यज्ञ, अनुष्ठान और कई तरह के संस्कार यहां पर संपन्न कराए जाते हैं। इसके अलावा श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भी श्रद्धालू पूजन-अर्चन करते है। महिलाएं इस दिन अधिक संख्या में पहुंचती हैं। सावन में भी श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger


छत्तीसगढ़ में मां के अपार भक्त

मां जलजलिया जिस स्थान पर विराजीं हैं वहां से छत्तीसगढ़ की सीमा महज कुछ किमी. दूर है। पहाड़ पार करते ही मध्य प्रदेश की सीमा समाप्त और छत्तीसगढ़ की सीमा शुरू हो जाती है। इसलिए छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती गांवों मेंं मां के अपार भक्त हैं। मां की महिमा का गुणगान वहंा खूब होता है।

-✍️✍️पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
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Thursday, June 11, 2020

बांधवगढ़ राट्रीय उद्यान 15 जून से खुलेगा लेकिन इस कोरोना महामारी में सावधानी और सुरक्षा के साथ जाए

Bandhavgarh national park 

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान  15 जून से खुलेगा



कोरोना महामारी के चलते 20 मार्च 2020 से बंद बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व का कोर जोन 15 से 30 जून तक पर्यटकों के लिये वापस खुलने जा रहा है। वर्षा ऋतु के दौरान पर्यटक बफर जोन में भ्रमण कर सकेंगे। रिजर्व के क्षेत्र संचालक श्री विंसेंट रहीम की अध्यक्षता में हुई बैठक में उक्त निर्णय लिया जाकर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की एडवाईजरी और गाइडलाईन पर विस्तृत चर्चा की गई।

शासन को भेजा प्रस्ताव

बैठक में हुई चर्चानुसार बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व को खोलने संबंधी तय किये गये दिशा-निर्देशों का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, जिसमेंपर्यटकों को प्रवेश गाइडलाइन के आधार पर ही मिलेगा। 10 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक आयु के पर्यटकों को प्रवेश नहीं दिया जायेगा। आई.डी. कार्ड दूर से दिखाना होगा। 6 पर्यटक एक ही परिवार से हैं तो उन्हें एक ही जिप्सी में प्रवेश दिया जायेगा। अगर एक परिवार से नहीं हैं तो एक जिप्सी वाहन में 4 पर्यटक भ्रमण करेंगे। सभी पर्यटक मास्क, सेनीटाइजर और दो गज दूरी के नियम का पालन करेंगे। कोई पर्यटक पार्क के अन्दर गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकेगा। सेन्टर पॉइंट पर खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं होगी। जिप्सी वाहन में प्रवेश और वापस आने पर वाहन मालिक को स्वयं ही सेनीटाइज कराना होगा।


होटल मालिक पार्क जाने से पूर्व पर्यटकों की थर्मल स्क्रीनिंग करेंगे। साथ ही पर्यटन गेट पर भी पुन: थर्मल स्क्रीनिंग होगी। प्रवेश द्वार को रोज तीन बार सेनीटाइज किया जायेगा। पर्यटकों के सम्पर्क में आने वाले जिप्सी चालक और गाइड मास्क और सेनीटाइजर का उपयोग अनिवार्य रूप से करेंगे। कोरोना जैसे लक्षण दिखने पर पार्क में प्रवेश हरगिज नहीं दिया जायेगा और तत्काल जानकारी प्रशासन को दी जायेगी।

क्षेत्र संचालक ने बताया कि सभी जिप्सी वाहन में सीट कवर नहीं होगा। पार्क के अन्दर थूकना प्रतिबंधित रहेगा। पानी की बोटल और खाने-पीने की चीजें डस्टबिन में न डालकर वाहन के अन्दर रखना होगा। बैठक में उप संचालक श्री सिद्धार्थ गुप्ता, एसडीओ श्री अनिल शुक्ला, पर्यटन प्रभारी श्री बीनू गहरवार, गाइड यूनियन के अध्यक्ष श्री राजेश द्विवेदी, जिप्सी यूनियन के अध्यक्ष श्री रतिभान सिंह और होटल यूनियन के अध्यक्ष श्री ज्ञानेन्द्र तिवारी उपस्थित थे।

--✍️✍️ पंकज द्विवेदी संचालक ब्लॉग
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Friday, June 5, 2020

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम , इस कोरोना काल में घर में रहकर ही मनाए विश्व पर्यावरण दिवस


विश्व पर्यावरण दिवस 2020 (World Environment Day 2020) : 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) मनाया जाता है. विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने के पीछे उद्देश्य है पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना. पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया. विश्व पर्यावरण दिवस या वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे को आप प्राकृति मां के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का दिन कह सकते हैं. इस दिन को मनाने की बड़ी वजह यह है कि लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत किया जा सकते. मनुष्य भी तो पर्यावरण और पृथ्वी का एक हिस्सा ही हैं. प्रकृति के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं. तो चलि‍ए जानते हैं कहीं न कहीं मनुष्य के अस्तित्व से भी जुड़े इस खास दिन के बारे में. क्या है विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास, महत्व, क्यों मनाया जाता है इसे और क्या है विश्व पर्यावरण दिवस  2020 की थीम.
कब हुई विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत, क्या है विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास (World Environment Day History)

जैसा कि हम बता चुके हैं कि पहली बार सन 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 5 जून को इस दिवस की नींव रखी. उसके बाद से हर साल इसी दिन यानी 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. असल में सन 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पर्यावरण और प्रदूषण पर स्टॉकहोम (स्वीडन) में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया था. जिसमें तकरीबन 119 देशों ने हिस्सा लिया था. इसके बाद 5 जून को विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाया जाने लगा. जानते हैं क्या है विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम...

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम (World Environment Day 2020 Theme)

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस को एक थीम दी जाती है. विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम है 'प्रकृति के लिए समय' (Time for Nature). इसका मकसद पृथ्वी और मानव विकास पर जीवन का समर्थन करने वाले आवश्यक बुनियादी ढांचे को प्रदान करने पर ध्यान दिया जाए.
World Environment Day 2020: 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है.

कोरोनावायरस के दौरान कैसे मनाएं विश्व पर्यावरण दिवस (How to celebrate World Environment Day)

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर दुन‍िया भर के देश आधिकारिक समारोह आयोजित करते हैं. लेकिन इस साल के मेजबान जर्मनी के साथ साझेदारी में कोलंबिया है. इस साल, COVID-19 महामारी के प्रकोप के कारण लाखों लोग डिजिटल रूप से विश्व पर्यावरण दिवस मनाएंगे. भले ही मनुष्य को लॉकडाउन ने हिला कर रख दिया हो, लेकिन पर्यावरण पर लॅाकडाउन का साकारत्मक प्रभाव पड़ा है.
क्यों मनाते हैं विश्व पर्यावरण दिवस, इसे मनाने की वजह
जैसा क‍ि बीते कई सालों से हम देखते, सुनते और पढ़ते आ रहे हैं विश्व में पर्यावरण प्रदूषण की समस्‍या विकराल होती जा रही है. इंसानों ने अपनी सुविधाओं के लिए संसाधनों का निर्माण किया, जिससे पर्यावरण पर बुरा असर हुआ. इस बुरे असर से होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए वैश्विक मंच बनाया गया. विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की वजह है लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना.

प्लास्टिक का प्रयोग न करें -
आज के समय में प्लास्टिक सबसे अधिक पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है. प्लास्टिक की वजह से कितने ही जीव आज विलुप्त होने की कगार में है. समुद्री जीवों को भी प्लास्टिक ने बहुत अधिक नुकसान पहुँचाया है. कछुए, मछली, सीबर्ड और अन्य जीव जन्तुओं को इसका सामना करना पड़ रहा  है.


बारिश के पानी का संग्रह -
आज के समय में मनुष्यों के लिए सबसे बढ़ी समस्या पानी है. लगातार पानी की कमी हो रही है. कई देशों में तो पानी न के बराबर रह गया है. ऐसे में बारिश के पानी का संरक्षण करना चाहिए.


कोयले की जगह अन्य एनर्जी सोर्स से बिजली बनायें -
कोयले से बिजली बनाने में कार्बन डायऑक्साइड और निट्रस ऑक्साइड गैस प्रकृति में मिल जाती है. इस लिए हमें कोशिश करना चाहिए कि हम बिजली बनाने में सौर्य ऊर्जा, पवन चक्की और अन्य सोर्स की मदद लें.


अधिक से  अधिक पौधें लगाना -
पौधे प्रकृति के लिए  बहुत जरुरी है यह पर्यावरण की हवा को शुद्ध करने के साथ ही तापमान को भी स्थिर रखने में मदद करते हैं. साथ ही ओक्सीजन का सोर्स भी है. जिसके बिना मनुष्य जिन्दा नहीं रह सकता है.

--✍️✍️✍️ पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
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Friday, May 22, 2020

रीवा के जंगलों में है लम्बी आयु प्रदान करने वाली दुर्लभ औषधि सोमवल्ली

मनुष्य और देवताओं में एक ही अंतर होता है। वो चिरायु होते हैं। उन्हे रोग नहीं जकड़ते। वो प्रदूषण से प्रभावित नहीं होते। वो वृद्ध नहीं होते लेकिन सवाल यह है कि उनके पास ऐसा क्या होता है जो मनुष्यों के पास नहीं होता। जवाब है कुछ ऐसी चमत्कारी आयुर्वेदिक औषधियां जो दुर्लभ हैं और मनुष्यों की सामान्य पहुंच से दूर होतीं हैं। ऐसी ही एक जड़ी बूटी का नाम है सोमवल्ली। यह मप्र के रीवा जिले के जंगलों में पाई जाती है।




सोमवल्ली को औषधियों की रानी भी कहते है। प्राचीन ग्रंथों, वेदों में सोमवल्ली के महत्व एवं उपयोगिता का व्यापक उल्लेख मिलता है। अनादिकाल से देवी देवताओं एवं मुनियों को चिरायु बनाने और उन्हें बल प्रदान करने वाला पौधा है सोमवल्ली। इसे महासोम, अंसुमान, रजत्प्रभा, कनियान, कनकप्रभा, प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान, चन्द्रमा, गायत्र, पवत, जागत, साकर आदि नामो से जानते हैं।

इसका वानस्पतिक नाम Sarcostemma acidum बताया जाता है। इसकी कई तरह की प्रजातियाँ होती हैं । इस पौधे की खासियत है कि इसमें पत्ते नहीं होते । यह पौधा सिर्फ डंठल के आकार में लताओं के समान है। हरे रंग के डंठल वाले इस पौधे को सोमवल्ली लता भी कहा जाता है। सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है । उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियाँ। सोम लताएँ पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जातीं हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेंद्र गिरि, विंध्यांचल, मलय आदि पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाये जाने का जिक्र है। कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है। यह गहरे बादामी रंग का पौधा है।

कोई भी व्यक्ति देव श्रेणी में पहुंच सकता है
समस्त जड़ी बूटियों में सोम जिसे संजीवनी बूटी के रूप में जानते  है, एक मात्र इतनी महत्त्वपूर्ण है  जिससे आठो प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त किये जा सकते हैं । आगे विशेषता बताते हुए कहा है कि अगर कोई भी जहरीला जानवर काट ले तो इस जड़ी का एक तोला चूर्ण शहद में मिलाकर लेने से कैसा भी जहर उतर जाता है । दूसरा प्रयोग बताते हुए कहा कि इस जड़ी का एक तोला चूर्ण शहद के साथ मिलाकर नित्य 30 दिनों तक सेवन करे तो किसी भी  व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है। मांस पेशीय सुदृढ़ होकर  शरीर की पुरानी चमड़ी उतर जाती है और उसके स्थान पर नयी चमड़ी निकल आती है।

जीवन की उच्चता प्राप्त करे "सफलता का राज श्रद्धा, धैर्य और विश्वास" कमजोर नेत्र ज्योति भी बढ़ जाती है और तो और कम सुनाई देने की समस्या ख़त्म होकर कानो से पूरा सुनाई देने लगता है और व्यक्ति हर प्रकार से नवीनता को प्राप्त कर लेता है । नागार्जुन के शिष्य समश्रुवा ने तो अपना पूरा जीवन ही इस संजीवनी के नए नए प्रयोगो में खपा दिया। जीवन के अंत समय में उसने कहा "आकाश के तारो को गिना जा सकता है मगर इस जड़ी के प्रभाव और महत्त्व को नहीं गिना जा सकता।" उसने बताया "इस प्रयोग के माध्यम से जमीन से ऊपर हवा में उठा जा सकता है। व्यक्ति वायु वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है।" उसने आगे कहा कि "मुझे कुछ और समय मिलता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसके प्रभाव से व्यक्ति अजर अमर हो सकता है क्योकि मृत्यु इससे नियंत्रण में रहती है। अतः आयुर्वेद के लिए यह औषधि वरदान से कम नहीं है।

रीवा के क्योटी, चचाई की घाटियों में पायी जाती है विश्व की दुर्लभतम औषधि सोमबल्ली, पावन घिनौची धाम "पियावन" में भी है मिलने की संभावना"

कहा जाता है कि यह दुर्लभतम औषधि आज भी रीवा के क्योटी एवं चचाई जलप्रपात की घाटियों में एवं कुण्ड के आस पास बहुतायत मात्रा में पाई जाती है ।

छह  वर्ष पहले जैव विविधता बोर्ड, मध्यप्रदेश शासन ने क्योटी को जैव विविधता संरक्षित क्षेत्र घोषित करने वन मंडल रीवा से माँगा था प्रस्ताव

रीवा के क्योटी में सोमबल्ली, मोरशिखा एवं पथरचटा जैसी दुर्लभतम औषधियाँ प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं। मध्यप्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड, भोपाल ने उपरोक्त औषधियों के बिना अनुमति व्यापारिक उपयोग हेतु संग्रहण प्रतिबंधित किया हुआ है। साथ ही संग्रहण करते पाये जाने पर दंडात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान है।

--✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
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Monday, May 18, 2020

विंध्यप्रदेश विधानसभा


15 अगस्‍त, 1947 के पूर्व देश में कई छोटी-बड़ी रियासतें एवं देशी राज्‍य अस्तित्‍व में थे। स्‍वाधीनता पश्‍चात् उन्‍हें स्‍वतंत्र भारत में विलीन और एकीकृत किया गया। 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के बाद देश में सन् 1952 में पहले आम चुनाव हुए, जिसके कारण संसद एवं विधान मण्‍डल कार्यशील हुए। प्रशासन की दृष्टि से इन्‍हें श्रेणियों में विभाजित किया गया था। सन् 1956 में राज्‍यों के पुनर्गठन  के फलस्‍वरूप 1 नवंबर, 1956 को नया राज्‍य मध्‍यप्रदेश अस्तित्‍व में आया। इसके घटक राज्‍य मध्‍यप्रदेश, मध्‍यभारत, विन्‍ध्‍य प्रदेश एवं भोपाल थे, जिनकी अपनी विधान सभाएं थीं।
                    पुनर्गठन के फलस्‍वरूप सभी चारों विधान सभाएं एक विधान सभाएं एक विधान सभा में समाहित हो गईं। अत: 1 नवंबर, 1956 को पहली मध्‍यप्रदेश विधान सभा अस्तित्‍व में आई। इसका पहला और अंतिम अधिवेशन 17 दिसम्‍बर, 1956 से 17 जनवरी, 1957 के बीच संपन्‍न हुआ।
                 

विन्‍ध्‍य प्रदेश विधान सभा
                    4 अप्रैल, 1948 को विन्‍ध्‍यप्रदेश की स्‍थापना हुई और इसे ''ब'' श्रेणी के राज्‍य का दर्जा दिया गया। इसके राजप्रमुख श्री मार्तण्‍ड सिंह हुए। सन् 1950 में यह राज्‍य ''ब'' से ''स'' श्रेणी में कर दिया गया। सन् 1952 के आम चुनाव में यहां की विधान सभा के लिए 60 सदस्‍य चुनें गये, जिसके अध्‍यक्ष श्री शिवानन्‍द थे। 1 मार्च, 1952 से यह राज्‍य उप राज्‍यपाल का प्रदेश बना दिया गया। पं. शंभूनाथ शुक्‍ल उसके मुख्‍यमंत्री बने। विन्‍ध्‍यप्रदेश विधान सभा की पहली बैठक 21 अप्रैल, 1952 को हुई। इसका कार्यकाल लगभग साढ़े चार वर्ष रहा और लगभग 170 बैठकें हुई। श्री श्‍याम सुंदर 'श्‍याम' इस विधान सभा के उपाध्‍यक्ष रहे।




(तत्‍कालीन विन्‍ध्‍यप्रदेश की विधान सभा का रीवा स्थित भवन)


केन्द्रीय सरकार के संरक्षण और दायित्व के आधार पर और श्री वी.पी.मेनन सचिव (रियासत संबंधी) भारत सरकार के परामर्श से  दिनांक १२ मार्च १९४८ को बुंदेलखंड और बघेलखंड के ३५ राजाओं ने मिलकर एक प्रसंविदा ( covenant ) तैयार किया जिसके अनुसार बघेलखंड-बुंदेलखंड की ३५ स्वतंत्र रियासतों ने एक यूनियन बनाने का निर्णय लिया जिसका नाम ‘’यूनाइटेड स्टेट ऑफ विंध्य प्रदेश’’ रखा गया था. रीवा राजा राज प्रमुख और पन्ना के राजा उप राज प्रमुख बनाए गए .दिनांक ४ अप्रैल १९४८ से इस नवीन राज्य का कार्य संचालन किया गया . “यूनाइटेड स्टेट ऑफ विंध्य प्रदेश” के राजप्रमुख को उच्च विधिकारी अधिकार दिए गए जो संघटित होने वाली देशी रियासतों के शासकों ने प्रसंविदा के अनुसार स्वीकार किया था.राज प्रमुख ने इस प्रदत्त अधिकार को अमल में लाते हुए राजस्व कानून को छोड़कर, रीवा रियासत के अन्य सभी क़ानून पूरे विंध्य प्रदेश में लागू कर दिए.सन १९४८ और १९४९ में ७२ आर्डिनेंस भी,जिन्हें क़ानून की मान्यता दी गयी,विंध्य प्रदेश में लागू हुए.
           “यूनाइटेड स्टेट ऑफ विंध्य प्रदेश” अधिक समय तक अपना कार्य नहीं कर सका .दिनांक २६ सितम्बर सन १९४९ को भारत सरकार और विंध्य प्रदेश की रियासतों के शासकों के मध्य एक एग्रीमेंट हुआ जिसके अनुसार १२ मार्च १९४८ का प्रसंविदा (covenant ) रद्द कर दिया गया और यूनाइटेड स्टेट ऑफ विंध्य प्रदेश १ जनवरी १९५० से समाप्त कर दिया गया .सभी ३५ रियासतों ने अपनी सत्ता,सारी शक्तियां और क्षेत्राधिकार  भारत सरकार को सौंप दिए .
          केंद्रीय सरकार ने विंध्य प्रदेश (एडमिनिस्ट्रेशन )आर्डर १९५० पारित किया जिसके तहत वह सभी क़ानून जो ३१ दिसंबर १९४९ तक विंध्य प्रदेश में लागू थे यथावत लागू रखे गए, जब तक वह सक्षम विधान सभा द्वारा संशोधित या निरसित न किये जायें . १६ अप्रैल १९५० से विंध्य प्रदेश पार्ट ‘‘सी’’ स्टेट हो गया और केन्द्रीय शासित प्रदेश बना. जनवरी ५० से जनवरी ५२ तक यह चीफ कमिश्नर के आधीन रहा..पार्ट सी स्टेट्स (लॉज) एक्ट १९५० के अनुसार २६० केन्द्रीय अधिनियम और अध्यादेश विंध्य प्रदेश में लागू कर दिए गए .इससे मिलते जुलते या तदनुरूप पहले से ही लागू अधिनियम निरस्त कर दिए गए तथा पार्ट ए स्टेट के ८ अधिनियम भी लागू कर दिए गए . १ मार्च १९५२ को श्री के. संथानम विंध्य प्रदेश के उपराज्यपाल हुए. पार्ट ‘‘सी’’ एक्ट में विधान सभा गठित करने का अधिकार था. अतः विंध्य प्रदेश में  अप्रैल १९५२ में विधान सभा बनी, जिसकी प्रथम बैठक दिनांक २१ अप्रैल १९५२ से  प्रारम्भ हुई.



          विंध्य प्रदेश विधान सभा ने अपने कार्यकाल में कुल ४४ अधिनियम बनाए . विंध्य प्रदेश में छोटी बड़ी जागीरें मिलाकर कुल २२०० जागीरें थीं. पवाईदार काश्तकारों और शिकमी काश्तकारों को सीर की जमीन से मनमाने ढंग से बेदखल कर देते थे और उन्हें बहुत परेशान करते थे.राज्य शासन के पास इस प्रकार की हजारों शिकायतें थीं .विधान सभा में सन १९५२ में विंध्य प्रदेश सीर  (बेदखली रोकने के लिए) विधेयक १९५२  पारित हुआ ,जिसके अनुसार पवाईदारों पर रोक लगाईं गयी जिससे किसानों को राहत मिली. इसी वर्ष जागीरदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम बना जिसने इस भू-भाग में एक सामाजिक क्रान्ति की. कृषि व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हुआ .किसान तथा सरकार  के बीच सीधा संपर्क स्थापित हुआ .भूमि को जोतने वाला भूमि का मालिक बना .जागीरदारी तथा पवाईदारी व्यवस्था उचित प्रतिकार देकर समाप्त कर दी गयी.१ जुलाई १९५४ से सभी २२०० छोटी बड़ी जागीरें समाप्त कर सरकार ने अपने आधीन में ले लीं.
        विधान सभा ने सन १९५५ में भूमि राजस्व और काश्तकारी अधिनियम स्वीकार किया . इसके अनुसार राजस्व और कृषि व्यवस्था में सुधार हुआ .काश्तकारों को अधिकार मिले .प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रचलित कानूनों में एकरूपता आई और किसानों की हालत सुधरी.
     विधान सभा ने प्राथमिक शिक्षा विधेयक स्वीकार किया और राज्य शासन को प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर देने को अधिकृत किया .स्वायत्त शासन के क्षेत्र में ग्राम पंचायत और नगर पालिका अधिनियम बने तथा १९५६ में भूदान यज्ञ अधिनियम बना जिसने आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को विधिमत मान्यता प्रदान कर दान में प्राप्त हुई भूमि की कानूनी व्यवस्था की.
       सदन की कुल १७० बैठकें हुईं. विधान सभा ने समितियों के माध्यम से प्रशंसनीय कार्य किया. विशेषाधिकार समिति,प्रार्थना पत्र समिति,आश्वासन समिति, सार्वजनिक लेखा समिति,प्राक्कलन समिति,वित्त समिति और नियमावली समिति  ने अत्यंत परिश्रम से समय समय पर अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किये.
        विधान सभा में कुछ अविस्मरणीय घटनाएं हुईं . राज्य शासन ने सन १९५२ में विधान सभा के सदस्यों को जिला सलाहकार समिति का सदस्य मनोनीत किया और उन्हें दैनिक भत्ता व  यात्रा व्यय मिलने लगा . विधान सभा में प्रश्न उठाया गया और यह लाभ का पद माना गया और अधिकाँश सदस्य निर्योग्य होने की स्थिति में आ गए . लोक सभा ने विंध्य प्रदेश लेजिस्लेटिव एसेम्बली प्रेवेंशन आफ डिस्क्वालिफिकेशन एक्ट १९५३ दिनांक २८-५-१९५३ को पारित कर उसे २६ अप्रैल १९५२ से लागू किया और सदस्य निर्योग्य होने से बच गए .
        विधान सभा में १६ नवंबर १९५४ को जब काश्तकारी क़ानून पर बहस चल रही थी , प्रदर्शनकारियों की भीड़ विधान सभा के अहाते में पुलिस का घेरा तोड़ कर घुस आयी. दिनांक २३-११-१९५५ को जब  विधान सभा में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रतिवेदन पर विचार हो रहा था , विन्ध्य विलय विरोधी प्रदर्शनकारी न केवल विधान सभा के अहाते में आ गए बल्कि वह सब सदन में भी प्रवेश पा गए और सदस्यों के साथ मारपीट की . इन दोनों घटनाओं पर विशेषाधिकार समिति का निर्णय तथा प्रतिवेदन संसदीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा .
         विधान सभा की सभी बैठकें सजीव व सफल रहीं . विवाद का स्तर ऊंचा और सदन की मर्यादा के अनुकूल रहा .सभी सदस्यों ने सदन की कार्यवाही में रूचि ली और उसकी गरिमा रखी तथा अनुशासन में बंधे रहे. लोगों को भ्रम था कि विंध्य प्रदेश में घोर अशिक्षा और सामंतवादी परम्पराओं के कारण प्रजातांत्रिक शासन चलना संभव न होगा परन्तु सदस्यों ने अपनी योग्यता , लगन और परिश्रम से इस भ्रम को झुठला दिया .
         सदन में प्रजातांत्रिक परम्पराओं को बनाने और कायम रखने में पंडित शम्भूनाथ शुक्ल , सरदार नर्मदा प्रसाद सिंह , श्री जगदीशचंद्र जोशी , श्री श्रीनिवास तिवारी , श्री रामकिशोर शुक्ल , श्री चंद्रप्रताप तिवारी , श्री दशरथ जैन, श्री रामाधार पांडे और श्री सरस्वती प्रसाद पटेल आदि ने अपना महान योगदान दिया . विधान सभा सचिवालय को श्री रमेशचंद्र श्रीवास्तव के रूप में कुशल सचिव प्राप्त हुए थे . उन्होंने सचिवालय का संगठन और संचालन बड़ी दक्षता से किया तथा सदन के कार्य में सहायता दी .
           विधान सभा में कई बार कठिन समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं जिसका हल निकालने में विंध्य प्रदेश के उपराज्यपाल श्री के. संथानम और भारत के प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं दिलचस्पी लेकर सदन की मदद की .
           संसदीय प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर है कि अध्यक्ष को सदन में बिना किसी पक्षपात और भय के अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए . उसे किसी दबाव में न आना चाहिए .सदस्यों को अध्यक्ष के आदेश का तत्काल पालन करना चाहिए .उसके साथ विवाद में उलझना नहीं चाहिए . तभी सदन में अनुशासन रहेगा और वह प्रजातंत्र का पवित्र भवन कहलायेगा.
                                                 ( मध्य प्रदेश विधान सभा रजत जयन्ती स्मारक ग्रन्थ १९८१ से )
लेखक- श्री शिवानंद जी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष, विंध्यप्रदेश 
साभार- शिवानंद सतना आरकाईब (Dr. P.N. Shrivastava)
--✍️✍️✍️  पंडित पंकज द्विवेदी   संचालक ब्लॉग
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Wednesday, May 13, 2020

विंध्यप्रदेश की पुनःस्थापना के प्रयास में विंध्यवासी - बघेली डिजिटल प्रमोटर और सपोर्टर श्रीवेन्द त्रिपाठी जी द्वारा विशेष जानकारी

जय विंध्य प्रदेश, जय बघेली॥
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विंध्य प्रदेश की पुनर्स्थापना के प्रयास में विंध्यवासी-  बघेली डिजिटल प्रमोटर और सपोर्टर श्रीवेन्द त्रिपाठी द्वारा विशेष जानकारी :

वर्तमान समय में विंध्य प्रदेश में कई ऐसे संगठन बन चुकें है. जिनका सपना विंध्य प्रदेश को पुनः स्थापित करने के साथ ही बघेली बोली को बघेली भाषा का दर्जा दिलाना है. इसके साथ ही विंध्य प्रदेश के बेरोजगारी की समस्या पर विषेश ध्यान देने के साथ ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाने की भी रणनीति तैयार कर चुके हैं, ये संगठन रीवा सीधी से लेकर भोपाल, दिल्ली तक फैले हुए है. विंध्य प्रदेश की स्थापना के लिए इन्होंने उसका नक्सा (मैप) , जनसंख्या और क्षेत्रफल के साथ साथ उसके आय के साधन, खनिज संपदा इत्यादि पर भी पूरी शोध करने के बाद विंध्य प्रदेश की स्थापना की मांग कर रहे हैं जो कि सर्वथा उचित है.
विंध्य प्रदेश के विलीनीकरण के समय शहादत देने वाले वीरों को विंध्यवासी भूले नहीं है. और उनकी शहादत किसी भी कीमत पर बेकार नहीं जाने देगे. साथ ही इस मिसन में विंध्य प्रदेश के साहित्यकार, रंगकर्मी और मीडिया भी अपनी विशेष भूमिका अदा कर रहीं हैं कहने का तात्पर्य यह है कि कलमकार और कलाकार दोनों कंधा से कंधा मिलाकर प्रयासरत है
. विंध्य प्रदेश में सभी तरह के खनिज संपदा के मौजूद होने के बाद भी ये अपने अस्तित्व में नहीं है यह एक बहुत ही चिंता का विषय है. आज भी यहाँ पर बेरोजगारी अपने चरम सीमा पर है. लोग रोजी रोटी कमाने के लिए महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर है. जिसके कारण हमारी कला, संस्कृति, रीति रिवाज, परंपराये भी विलीन हो रही है. हमारे विंध्य प्रदेश में अपार प्राकृतिक संपदा भी है यहाँ तक कि ऐसी ऐसी संपदा है जो पूरे भारत में कहीं नहीं है समृद्धि का प्रतीक हीरा की खदानें भी विंध्य की धरातल पर विद्यमान है, कोयला के विसाल भंडार के साथ साथ पर्वत, नदी, और उपजाऊ भूमि की भी भरमार है, मौसम और जलवायु भी अब्बल दर्जे का है फिर भी विंध्य प्रदेश अपने अस्तित्व में क्यों नहीं है? यह एक विचारणीय  पहलू है. आखिर कब तक विंध्य प्रदेश के निवासी ये सब कुछ जानते हुए भी रोजी रोटी के लिए दर दर भटकता रहेगा...!
अब विंध्यवासी हर प्रयास के लिए तैयार है लेकिन विंध्य प्रदेश को अपने अस्तित्व में लायेंगे जरूर
जय विंध्य प्रदेश, जय बघेली॥

Friday, March 6, 2020

भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद आटिका महापर्व मुकुन्दपुर , विंध्यप्रदेश


मुकुंदपुर का आटिका महापर्व

रीवा राज्य के 25 वे महाराजा भाव सिंह जूदेव ने सन 1684-85 में पुरी (उड़ीसा) से भगवान जगन्नाथ जी ,बलभद्र एवं सुभद्रा माता की विशाल प्रतिमाएं स्थापित कराकर आटिका महाप्रसाद की परंपरा की सुरुआत की थी । कहा जाता है कि रीवा महाराजा स्वयं उपस्थित होकर यहाँ का महोत्सव संपन्न कराते थे किंतु बाद में आटिका महाप्रसाद की परंपरा बीच में बंद हो गयी थी । वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद मुकुंदपुर के स्थानीय निवासी  पंडित ब्रजवासी राम शुक्ल , बिहारीलाल गुप्त एवं मुखिया श्यामसुंदर त्रिपाठी ने एक आटिका कमेटी का गठन आसपास के ग्रामो का जनसहयोग लेकर पुनः विधिवत आटिका महाप्रसाद महोत्सव मनाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कराया तब से यह उत्सव निरंतर उत्तरोत्तर विकासोंन्मुख है ।
फाल्गुन की पूर्णमासी एवं चैत्र मास की प्रतिपदा को दो दिवसीय इस महोत्सव में यहाँ मेला लगता है । भक्त प्रहलाद के नाटक के साथ विविध मनोरंजक कार्यक्रम होते है तथा दोपहर 12 बजे भगवान को भोग लगाने के बाद आटिका महाप्रसाद का वितरण प्रारम्भ होता है जो रात्रि 12 बजे तक चलता है ।

अब आटिका महाप्रसाद चढाने का जिम्मा व्यक्तिशः हो गया है। धनी -मानी लोग प्रबंधन समिति में आवेदन लगाकर इसका पूरा खर्च उठा लेते है ।
इस वर्ष 10 मार्च 2020 को आटिका महाप्रसाद महापर्व मनाया जायेगा जिसमे आटिका महाप्रसाद चढाने का सौभग्य मुकुंदपुर के श्री दया गुप्ता पिता स्व. यज्ञनारायण गुप्ता को प्राप्त हुआ है । इसके पूर्व प्रबंधन समिति के सहयोग से दिनाँक 2 मार्च 2020 से साप्ताहिक भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ भी आयोजित किया गया है ।


व्यक्तिशः आटिका महाप्रसाद चढ़ाने वालो की सूची -

1. श्री शिवदीन गुप्ता सतना वर्ष 1952
2. श्री हीरालाल चिकवा मुकुंदपुर वर्ष-1982
3. श्री रामनिवास गुप्ता रामनगर वर्ष- 1989,90,93,95
4. श्रीमती लल्ली देवी पति सौखिलाल  गुढ़  वर्ष-1996
5. श्री गंगा प्रसाद गुप्ता रामपुर नैकिन  वर्ष- 1997
6. साधूलाल गुप्ता रायपुर कर्चुलियान वर्ष-1998
7.बघेल परिवार जमुना,कस्तरा, सुकुलगंवा  वर्ष -1999
8. विजयकुमार गुप्त हिनौती (सतना) वर्ष-2000,2001,2002
9.गंगा सिंह बुढगौना (सीधी)वर्ष- 2003
10. बद्री प्रसाद त्रिपाठी मुकुंदपुर  वर्ष- 2004
11. मंदिर प्रबंधन समिति मुकुंदपुर , वर्ष- 2005
12. रामाधार गुप्ता न्यू रामनगर , वर्ष-2006
13. जगदीश प्रसाद गुप्ता कोठीवाल सीधी , वर्ष-2007
14. महादेव प्रसाद तिवारी मुकुंदपुर , वर्ष-2008
15. डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह (पूर्वमंत्री) अमरपाटन, वर्ष-2009
16.बघेलपरिवर जमुना, कस्तरा,शुक्लगवाँ वर्ष 2010
17.बड़ा अखाडा मैहर +प्रतीक त्रिपाठी मुकुंदपुर , वर्ष -2011
18.सुरेंद्र ताम्रकार (पान वाले ) फोर्ट रोड रीवा, वर्ष-2012
19.मुन्नालाल गुप्ता रिमड़ा अमरपाटन, वर्ष-2013
20.हनुमान समिति कृष्णम भइया भीषमपुर, वर्ष-2014
21.श्रीमती रामसखी पत्नी रामहित्त गुप्त सतना,वर्ष-2015
22.जयपाल सिंह तिवारी मढ़ी मुकुंदपुर, वर्ष 2016
23. धर्मेंद्र सिंह तिवारी मढ़ी (मुकुंदपुर) वर्ष-2017
24. हरीश त्रिपाठी नकटी(वर्तमान- नायनपुर) , वर्ष-2018
25.मोहन लाल ताम्रकार , वर्ष-2019
26.दया गुप्ता  मुकुंदपुर , वर्ष-2020

2030 तक आटिका की बुकिंग-

श्री जगन्नाथ मंदिर मुकुंदपुर की आस्था का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2030 तक आटिका प्रसाद की बुकिंग हो चुकी है । अगर कोई चाहे इससे पहले आटिका चढ़ता तो होली के फगुआ के दिन तो संभव नहीं है। इसके लिए पूर्णिमा का विकल्प रखा गया है ।
जगन्नाथ भगवान के आटिका का महाप्रसाद लेने   बड़ी दूर-दूर से लोग आते  है रीवा,सतना, सीधी,सिंगरौली ,शहडोल,गोविन्दगढ़,मैहर, इतियादि जगह से आते है


✍✍✍✍----- पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग- Vindhya pradesh the land of white tiger

Wednesday, March 4, 2020

यहाँ विस्तार से जानिए, बाघो की पहली पसंद क्यों रहे विंध्य के जंगल

Vindhya pradesh the land of White Tiger


World wildlife Day ;  यहाँ विस्तार से जानिए, बाघों की पहली पसंद क्यों रहे, विंध्य के जंगल

विंध्य में वनों की विविधता से जंगल बने रहे बाघों का बसेरा
- दूसरे हिस्सों से आकर अब भी विंध्य के जंगलों में भ्रमण कर रहे हैं बाघ

world wildlife Day, Vindhya forests are the first choice of tigers
रीवा. विंध्य के जंगलों से बाघों का गहरा नाता रहा है। लंबे समय से यहां पर इनका बसेरा रहा है। इन जंगलों में वह सभी संसाधन मौजूद रहे हैं जो बाघों एवं अन्य जानवरों को आकर्षित करते रहे हैं। यहां का भौगोलिक परिदृश्य ऐसा रहा है कि बाघों को उनकी इ'छा के अनुरूप ठहरने और टहलने में कोई रुकावट नहीं होती थी। अब से करीब पांच दशक पहले तक बाघों को मारने में कोई प्रतिबंध नहीं था, इस वजह से बड़ी संख्या में इनका शिकार भी होता था, इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां पर आते रहे हैं। इस क्षेत्र के जंगलों की संरचना ऐसी रही है कि ऊंचे पहाड़ों में घने वन रहे और उनके नीचे नदियों की श्रृंखला रही है। कुछ जगह तो जलप्रपात भी हैं, जिसकी वजह से पानी की जरूरत भी पूरी हो जाती थी। देश में घटती बाघों की संख्या के चलते साठ के दशक से ही जंगल एवं बाघों की सुरक्षा की चर्चा शुरू हो गई थी। इसे कानूनी रूप देने में करीब दस वर्ष का समय लगा और बाघों को विशेष दर्जा देते हुए इनके संरक्षण की शुरुआत की गई। लगातार घटती संख्या का असर विंध्य में भी पड़ा, यहां के जंगलों से बाघ गायब हो गए। लगातार प्रयास होते रहे, जिसकी वजह से अब नेशनल पार्क, ह्वाइट टाइगर सफारी और चिडिय़ाघर स्थापित कर फिर से बाघों की वापसी की गई है। साथ ही अन्य जानवरों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू हुए हैं।


- दूसरे जंगल छोड़कर यहां भागकर आ रहे बाघ
पहले देश भर में विंध्य बाघों को लेकर चर्चा रहा है। इनदिनों एक बार फिर यह क्षेत्र बाघों की पसंद का क्षेत्र बनता जा रहा है। पन्ना के नेशनल पार्क से जो बाघ निकलते हैं वह इसी ओर आते हैं। पन्ना से निकलकर सतना के सरभंगा से लेकर रीवा के सेमरिया के जंगल तक बाघ पहुंच रहे हैं। इनदिनों इसी क्षेत्र में ही छह से आठ के बीच में बाघों ने अपना डेरा जमा रखा है। इसी तरह बांधवगढ़ के नेशनल पार्क से निकलने वाले बाघ सीधी के मझौली, सतना के रामनगर, रीवा के गोविंदगढ़ के जंगल तक पहुंच रहे हैं। बीते साल ही करीब आधा दर्जन ऐसी घटनाएं हुई जिसमें गांवों तक बाघ पहुंचे हैं। रीवा जिले के डढ़वा गांव में करीब आठ घंटे तक बाघ की मौजूदगी से पूरे जिले में हड़कंप मच गया था। कई टीमों ने इसे रेस्क्यू कर सीधी के नेशनल पार्क में छोड़ा। इससे यह साबित होता है कि अब भी यहां के जंगल बाघों के अनुकूल हैं, जिसकी वजह से दूसरे क्षेत्रों से आकर यहां पर बाघ ठहरने का प्रयास कर रहे हैं।
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बाघों को मारने पर लगाया प्रतिबंध
वाइल्ड लाइफ संरक्षण को लेकर रीवा लंबे समय से प्रमुख केन्द्र के रूप में जाना जाता रहा है। 1951 में एक ऐसा घटनाक्रम हुआ कि उसके बाद से इस क्षेत्र में बाघों का संरक्षण शुरू हो गया। महाराजा मार्तण्ड सिंह को सीधी के कुसमी के जंगल में शिकार के दौरान बाघ का शावक मिला जो सफेद रंग का था। उसे पकड़वाकर गोविंदगढ़ लाया गया और किले में रखा गया। उस दौर में बाघों का जो जितना अधिक शिकार करता था, उसी के अनुरूप उसका वैभव भी माना जाता था। रीवा, सतना एवं सीधी के जंगलों में शिकार करने के लिए दूसरे राÓयों के राजा-महाराजा भी बुलाए जाते थे। साथ ही अन्य शिकारी भी चोरी-छिपे मारते रहे हैं। कुछ वर्षों के बाद मार्तण्ड सिंह ने बाघों का शिकार नहीं करने की घोषणां की और विंध्य के आम लोगों से भी इसकी अपील की। विंध्य प्रदेश के समय इन्हें विशेष शक्तियां भी मिली हुई थी, इस वजह से बाघों का शिकार धीरे-धीरे बंद होने लगा। बाद में केन्द्र सरकार ने वन एवं वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम बनाया, जिसमें बाघों के साथ ही जंगल के सभी जानवरों को मारने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
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- इंसान से अधिक सम्मान बाघ को मिला
वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर अब दुनियाभर में प्रयास शुरू किए जा रहे हैं। इसकी शुरुआत अब से 70 वर्ष पहले ही रीवा में हो गई थी। यहां गोविंदगढ़ किले में रखे गए पहले जीवित सफेद बाघ मोहन को लोगों की ओर से ऐसा सम्मान दिया गया, जो इंसान से भी अधिक था। महाराजा मार्तण्ड सिंह ने सफेद बाघ मोहन को आप कहकर संबोधित करते थे। इसका असर किले के व्यक्ति पर हुआ और यहां पर आने वाला हर कोई मोहन को उसी तरह का सम्मान देता था। कहा जाता है कि उस समय मोहन के सम्मान में उसके बाड़े के पास कोई तेज आवाज से नहीं बोलता था। इसी से वन्यजीवों के प्रति लगाव भी क्षेत्र के लोगों का बढ़ा। मोहन की जब मौत हुई थी तो उसका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इतना ही नहीं कई दिनों तक रीवा के साथ ही आसपास के जिलों में भी शोक सभाएं आयोजित की गई। कुछ समय पहले दिल्ली के एक प्रोफेसर ने शोध में यह बताया था कि देश में वन्य जीवों में जितना सम्मान मोहन को मिला, दूसरे जानवरों को नहीं मिला है।
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सफेद बाघों को खुले जंगल में छोडऩे का प्रयोग
सफेद बाघों को लेकर देश के साथ ही दुनिया के कई हिस्सों में शोध हुए हैं। दावा है कि वर्तमान में जहां पर भी सफेद बाघ मौजूद हैं, वह रीवा से भेजे गए पहले सफेद बाघ मोहन के वंशज हैं। लंबे अंतराल के बाद विंध्य के मुकुंदपुर जंगल में एक प्रयोग किया गया और दुनिया की पहली ह्वाइट टाइगर सफारी बनाई गई। यहां पर पहले एक सफेद बाघिन को छोड़ा गया, इसके बाद एक बाघ भी छोड़ा गया। इनदिनों सफेद बाघ का जोड़ा सफारी के खुले जंगल में विचरण कर रहा है। अब तक जहां पर भी सफेद बाघ रहे हैं, उन्हें चिडिय़ाघरों में ही रखा जाता रहा है। लेकिन इनके वंश को बढ़ाने की लगातार उठ रही मांगों के बीच खुले जंगल में छोडऩे की योजना भी सरकार की ओर से बनाई जा रही है। मिली जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश की सरकार ने वर्ष 2012 में ही एक प्रस्ताव नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी को प्रस्ताव भेजा था। उस दौरान भारतीय वन्यजीव संस्थान ने अनुमति नहीं दी थी। कुछ समय पहले ही संस्थान की ओर से नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी को कहा गया है कि सफेद बाघों को जंगल में बसाया जा सकता है। अब तक यह कहा जाता रहा है कि चिडिय़ाघरों में रहने की वजह से इन बाघों को खुले जंगल में नहीं रखा जा सकता, इनके लिए खुला जंगल उपयुक्त नहीं होगा। लेकिन मुकुंदपुर के ह्वाइट टाइगर सफारी में लगातार करीब चार वर्षों से रह रहे बाघों की रिपोर्ट के साथ ही अन्य कई स्थानों पर अध्ययन के बाद माना गया है कि खुले जंगल में सफेद बाघों को रखा जा सकता है। प्रदेश सरकार ने भी विंध्य क्षेत्र में ही यह प्रयोग करने की तैयारी की है। जिसमें सीधी जिले के संजयगांधी नेशनल पार्क को चिन्हित किया जा रहा है। यहां पर अब रायल बंगाल टाइगरों के बीच ही सफेद बाघ को भी जंगल में छोड़ा जाएगा। इसमें सीधे चिडिय़ाघर के बाघ नहीं छोड़े जाएंगे बल्कि सफारी में कुछ दिन पहले के बाद ही जंगल में छोड़ा जाना है।
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वन्यप्राणियों के प्रति लगाव बढ़ाने का माध्यम बना चिडिय़ाघर
विंध्य क्षेत्र के जंगलों में बाघों के साथ ही हिरणों की प्रजाति के बड़ी संख्या में जानवरों का ठिकाना रहा है। यहां लोगों में जानवरों के प्रति जानने की जिज्ञासा भी रही है। पहले बांधवगढ़ और पन्ना में नेशनल पार्क बनाया गया, इसके बाद सीधी जिले में सबसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र का संजयगांधी नेशनल पार्क स्थापित किया गया। बाद में छत्तीसगढ़ राÓय के गठन के चलते बड़ा हिस्सा सरगुजा और कोरिया जिलों में चला गया। सीधी जिले में ही काले मृगों का संरक्षण करने के लिए बगदरा अभयारण्य भी बनाया गया है। इतना ही नहीं कि विंध्य केवल बाघों और हिरणों तक सीमित रहा हो, सोन नदी में मगरों के लिए भी क्षेत्र आरक्षित किया गया है। कुछ समय पहले ही विंध्य क्षेत्र के मुकुंदपुर में चिडिय़ाघर और ह्वाइट टाइगर सफारी की शुरुआत हुई है। इसकी वजह से वन्यजीवों के प्रति क्षेत्र के लोगों को जानकारी भी हो रही है। दूर-दूर से लोग चिडिय़ाघर के जानवरों को देखने के लिए आते हैं। बाड़ों के बाहर से ही जानवरों की तस्वीरें लेकर लोग इनके बारे में अपनी प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर व्यक्त कर रहे हैं। वन्यजीवों के प्रति जानकारी लोगों तक पहुंचाने में यह कारगर साबित हो रहा है। वर्तमान में महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं टाइगर सफारी मुकुंदपुर में जानवरों की संख्या -
 सफेद बाघ चार, सिंह तीन, रायल बंगाल टाइगर 6, तेंदुआ चार, भालू तीन, करीब आधा सैकड़ा की संख्या में चीतल, बाइल्डबोर तीन, ब्लैक बक पंद्रह, सांभर आठ, नील गाय तीन, चौसिंघा एक,थामिन डिअर 8 सहित अन्य जानवर हैं।
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वन्यजीव विशेषज्ञ की नजर में.............

वन्यजीव ही शान हैं, इनके बिना अस्तित्वहीन हो जाएंगे जंगल
मनुष्य का अस्तित्व वन्यजीवों के अस्तित्व से जुड़ा है, जंगलों में रह रहे सभी वन्यजीवों का इकालाजिकल बैलेेंस स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी जंगल से बाघों या अन्य मांसाहारी जीवों को अलग कर दिया जाए तो कालांतर में वह जंगल अपने आप नष्ट हो जाएगा। मांसाहारी जंतुओं के न रहने से शाकाहारी जंतुओं की संख्या में वृद्धि होने के कारण शाकाहारी पौधे धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। ठीक इसी तरह यदि किसी जंगल से सभी पक्षियों को हटा दिया जाए तो भी जंगल अपने आप समय के साथ नष्ट हो जाएंगे। क्योंकि जंगलों में पौधों में फूलों के परागण करने एवं बीज निर्माण तथा फलों को खाकर बीजों के वितरण में पक्षी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस कारण पौधों की जैव विविधता बनी रहती है। पौधों एवं वन्य जीवों की जैव विविधता परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर रहती है। जंगलों में पाए जाने वाले बहुत से कीटों की गांव के खेतों में उगने वाले पौधों के परागण एवं बीज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इस प्रकार देश के जंगल अपने वन्यजीवों द्वारा समाज को सेवाएं दे रहे हैं। इन कीटों के न रहने से संबंधित फसलों की पैदावार अपने आप खत्म हो जाएगी। मधुमक्खियों द्वारा शहद निर्माण कर समाज को प्रदान करना एक-दूसरा इको सिस्टम सर्विसेस का उदाहरण है। विंध्य क्षेत्र के जंगलों में से रीवा-सतना के चित्रकूट, मझगवां, ककरेड़ी, गोविंदगढ़ एवं अंतरैला क्षेत्र के जंगलों का अपना अलग महत्व है। देश के मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंगल या तो साल प्रभावी जंगल होते हैं या सागौन प्रभावी, लेकिन विंध्य के उपरोक्त क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंगल न तो साल प्रभावी हैं और न ही सागौन प्रभावी। विध्ंय क्षेत्र की खूबसूरत भौगोलिक संरचना के कारण ही यहां पर बांधवगढ़, पन्ना एवं संजयगांधी नेशनल पार्क के साथ कई अभयारण्य तथा अमरकंटक का अचानकमार बायोस्फियर रिजर्व स्थापित है। देश का शायद ही ऐसा कोई भूखंड होगा, जहां इस प्रकार वन्यजीवों से धनी वास स्थान होगा। विंध्य के तीनों नेशनल पार्क, अभयारण्य एवं बायोस्फियर रिजर्व आपस में कारीडोर से जुड़े होने के कारण वन्यजीवों की प्रचुरता को बढ़ाते हैं। अत: इन कारीडोर्स को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी विंध्य के सभी लोगों की होती है। कभी-कभी पन्ना नेशनल पार्क के बाघों का चित्रकूट, ककरेड़ी एवं बरदहा घाटी के जंगलों में विचरण करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह क्षेत्र एक प्रमुख कारीडोर है, इसको सुरक्षित रखते हुए रीवा के तराई क्षेत्र में नीलगाय की जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण किया जा सकता है।
प्रो. रहस्यमणि मिश्रा, पर्यावरण एवं जीव विज्ञान विशेषज्ञ
(अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के पूर्व कुलपति

वन्यजीवों की संख्या एक नजर में

रीवा

तेंदुआ- 8
भालू- 42
नीलगाय- 3852
जंगली सूअर- 1374
भेड़िया- 25
लकड़बग्गा- 128
चीतल- 108
सांभर- 186
हिरण-76
चौसिंगा-11
चिंकारा-92
लोमड़ी-147
सियार- 779
मोर-330
बाघ- 3


सतना-

टाइगर- 5
इंडियन वोल्फ-40
हाइना-128
हिरन-145
वाइल्ड डॉग-09
लेपर्ड-122
इंडियन फॉक्स-169
गोल्डन जैकाल-696

सीधी

बाघ- 21
तेंदुआ-10
भालू-340
जंगली सूअर-3005
लकड़बग्गा-118

✍✍✍✍---  पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग- vindhya pradesh the land of white tiger

Thursday, January 9, 2020

सफेद बाघ को फिर से विंध्य के जंगल में बसाया जायेगा (There will be again attempt to settle the white tiger to forest of vindhya )

सफेद बाघ को फिर से विंध्य के जंगलों में बसाया जाएगा--
रीवा ,

अभी तक पर्यटकों और वन्य जीव प्रेमियों के लिए सफेद बाघ एक पहेली की तरह रहा है ,साथ ही वह आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था यदि सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले समय में सफेद बाघ विंध्य के जंगल में विचरण करते मिलेंगे। वर्ष 2012 से इस संबंध में पहल की जा रही थी लेकिन पहली बार सफेद बाघ को खुले जंगल में छोड़ने के लिए विशेषज्ञ ने सरकार को हरी झंडी दे दी गयी है ।
आठ साल पहले प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल कंजर्वेशन ऑथॉरिटी ऑफ़ इंडिया से सफ़ेद बाघो को जंगल में बसाये जाने को लेकर पत्र लिखा था उस समय N.T.C.A.  ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था । लेकिन उसके बाद से सफ़ेद बाघो पर लगातार शोध किये गए और अब एक माह पूर्व भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एनटीसीए की रिपोर्ट के बाद सरकर को पत्र लिखकर सफ़ेद बाघ को जंगल में खुला छोड़े जाने पर सहमति दे दी है । इस संबंध में प्रदेश सरकार द्वारा चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन (वन बल प्रमुख) को पत्र लिखकर इस दिशा में संभावना तलाशे जाने को कहा है ।
चूँकि विंध्य की धरती सफेद बाघ की जन्मभूमि रही है । इसलिए स्वाभाविक रूप से यहाँ का दावा सबसे पहले बनता है। उम्मीद है सरकार यही के जंगल में सफ़ेद बाघ को बसाने की योजना बनायेगी।

रॉयल बंगाल टाइगर से अलग --

अभी तक विशेषज्ञ यह मानते रहे की सफ़ेद बाघ रॉयल बंगाल टाइगर (पीले बाघ) से अलग नहीं है बस यह जीन से संक्रमण के कारण सफ़ेद रंग के हो गए हाल ही में सामने आयी रिपोर्ट में लंबे शोध के बाद यह माना गया कि बास्तविक रूप से सफेद बाघ अन्य बाघो से अलग प्रजाति के है। यह बात अलग है कि इन्हें फिलहाल जंगल में खुला इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता है कि यह अभी केवल चिड़ियाघरों और सफारी में ही है। जंगल में खुला छोड़ने के लिए लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा । तब कही जाकर यह खुले जंगल में रह पाएंगे।

प्रदेश में अभी सिर्फ नौ सफेद बाघ है  ---

मध्य प्रदेश में अभी चिड़ियाघरों में कुल 9 सफ़ेद बाघ मौजूद है ।इनमें विंध्य के महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में एवं इंदौर के चिड़ियाघर में  सफेद बाघ मौजूद है । खुले जंगल में अभी एक भी बाघ नहीं है । देश और दुनिया में जितने सफ़ेद बाघ है। वह सभी चिड़ियाघर में ही है ।  विश्व में पहली बार व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में एक निर्धारित क्षेत्र में उन्हें खुला छोड़ा गया है। मुकुंदपुर जू में लाईनेस बच्चो को जन्म भी दिया लेकिन सफेद बाघ का कुनबा अभी बढ़ना शेष है। सफारी प्रबंधन को उम्मीद है कि आने वाले समय में यहाँ सफेद बाघ का प्रजनन हो सकेगा इस संबंध में भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ  ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भी रिपोर्ट दे दी है।

सभी सफेद बाघ मोहन के ही वंशज है ---

विंध्य क्षेत्र सफेद बाघ की जन्मभूमि है । सन 1952 में तत्कालीन रीवा राज्य के महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव को शिकार के दौरान जंगल में सफेद शेर (बाघ) का शावक मिला था जिसे पकड़कर गोविन्दगढ़ किले में परवरिश की गयी और उसका नाम मोहन रखा गया ।
मोहन से 34 बाघ पैदा हुए । आज देश और दुनिया में जहाँ भी सफ़ेद बाघ है वह मोहन के ही वंशज है जानकारी के मुताबिक देश में इस समय 114 सफ़ेद बाघ विभिन्न चिड़ियाघरों में मौजूद है।
शोध में यह भी कहा गया है कि जंगल में संघर्ष करके अपने आप को सर्बाइब करने में पूरी तरह सक्षम है वशर्ते इसके लिए एक कारगार बाघ प्रोजेक्ट की जमीन तैयार की जाये ।

✍️✍️✍️.. पंडित पंकज द्विवेदी संचालक ब्लॉग- vindhya pradesh the land of white tiger

Tuesday, December 31, 2019

नए साल 2020 पर शारदा माता मंदिर मैहर में उमड़ेगी भक्तो की आस्था यहाँ देश विदेश से आने वाले भक्तों का लगेगा ताँता400 जवान तैनात किये गए सुरक्षा व्यवस्था के लिए


नए साल 2020 के आगाज के लिए इस साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर से ही मैहर में चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था कर दी गयी है। मैहर दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए 400 जवानों का बल मंगलवार की शाम 4 बजे लगा दिया गया है। यह पुलिस बल एक जनवरी के दिन भी मौजूद रहेगा। रक्षित निरीक्षक सत्य प्रकाश मिश्रा ने बताया कि हर साल की तरह इस बार भी मैहर में सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के प्रभारी एएसपी रहेंगे।

इनके साथ 4 डीएसपी, 10 टीआई ड्यूटी में होंगे। नौवीं बटालियन रीवा से एसएएफ की दो कंपनी ड्यूटी के लिए आ रही है। 100 होमगार्ड जवान होंगे और 200 जिला पुलिस बल के अधिकारी व कर्मचारी लगाए जाएंगे। सीसीटीवी कैमरों को भी दुरुस्त कर लिया गया है। साथ ही पुलिस कंट्रोल रूम में भी कमियों को पूरा किया जा रहा है ताकि मैहर में आने जाने वाले दर्शनार्थियों पर कैमरे की मदद से भी नजर रखी जा सके।



क्या है मैहर मंदिर का महत्व
कहते हैं मां हमेशा ऊंचे स्थानों पर विराजमान होती हैं। जिस तरह मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए भक्त वैष्णो देवी तक पहुंचते हैं। ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी 1063 सीढ़ियां लांघ कर माता के दर्शन करने जाते हैं। सतना जिले की मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर कहा जाता है। मैहर का मतलब है मां का हार। मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। मां शारदा देवी का मंदिर पर्वत की चोटी के मध्य में। देश भर में माता शारदा का अकेला मंदिर सतना के मैहर में ही है। इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरवी, भगवान, हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमती माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।

_________✍✍✍ पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग - vindhya pradesh the land of white tiger


नए साल के प्रथम दिवस महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में नहीं होगा साप्ताहिक अवकाश




महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर हर बुधवार को बंद रहता है ।लेकिन इस मर्तबा नए साल का पहला दिन बुधवार को है। लेकिन इसे खोलने के लिए सेंट्रल जू अथॉरिटी ऑफ इंडिया से अनुमति ले ली गयी है  क्योंकि बड़ी संख्या में पर्यटक नए साल का जश्न मनाने यहाँ पर आते है।

न्यू ईयर सेलिब्रेशन के लिए चिड़ियाघर तैयार है सारी तैयारियां कर प्रबंधन ने पूरी कर ली है । वन रेंजों से कर्मचारी मांगे गए है । भीड़ को ध्यान में रखते हुए टिकट के 8 काउंटर बनाये गए है पर्यटकों को सफारी घुमाने के लिए 3 बसे लगायी जायेगी दो दिन जू में जमकर भीड़ रहेगी।
ज्ञात हो की हर साल नए साल को रात में जश्न और दिन में लोग पर्यटन का आनंद उठाते है । महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर और वाइट टाइगर सफारी में इस दिन भारी भीड़ रहती है । पिछले साल 15 से 20 हजार के करीब लोगो ने नये साल में चिड़ियाघर पहुंचकर पर्यटन का मजा लिया था  जिससे वन विभाग को 4 से 5  लाख के करीब आय हुई थी।
इस मर्तबा भी कुछ इसी तरह की भीड़ की उम्मीद की जारही है । भीड़ को देखते हुए प्रबंधन ने पहले ही तैयारी कर ली है । 1 जनवरी को स्पेशल व्यवस्थाएं रहेगी । टिकट काउंटर इसदिन बढाकर 8 कर दिए है पहले यह संख्या 2 थी ।





पर्यटकों की संख्या को देखते हुए विशेष इंतजाम किये जायेंगे --

भीड़ को देखते हुए प्रबंधन की भी व्यवस्था की है । जिसमे रीवा और सतना के वनकर्मियों को भी बुलाया गया है।
पूर्व में भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया था जिसके चलते इसबार चौकसी बरती जा रही है ।
भीड़ के दौरान यदि किसी को स्वास्थय संबंधी दिक्कते होती है तो तुरंत उपचार की व्यवस्था कराई जाएगी। इसके अलावा किसी अनहोनी को रोकने के लिए फायर बिग्रेड भी मौके पर मौजूद रहेगा ।


✍✍✍--- पंडित पंकज द्विवेदी
 संचालक ब्लॉग - vindhya pradesh the land of white tiger

Monday, November 25, 2019

बांधवगढ़: शयन मुद्रा में भगवान विष्णु


ये है शिवपुराण का रहस्यमयी पहाड़
सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।


अब तक आपने भगवान विष्णु की अनेक प्रतिमाएं देखी होंगी। क्षीर सागर में विश्राम मुद्रा में उनका स्वरूप कम ही देखने मिलता है। आज हम आपको ऐसे ही स्थान पर ले जा रहे हैं। जो है तो एक किले में लेकिन राष्ट्रीय उद्यान के लिए पहचाना जाता हैै। भगवान विष्णु की विशालकाय प्रतिमा अति आकर्षक एवं रहस्यात्मक है। मध्यप्रदेश उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ में। जिसे आमतौर पर लोग नेशनल पार्क के लिए जानते हैं। इस अद्भुत किले बांधवगढ़ का नाम यहां मौजूद एक पहाड़ के नाम पर ही रखा गया है और इस पहाड़ पर ही स्थित है ये रहस्यमयी किला जिसका निर्माण करीब 2 हजार साल पहले कराया गया था। सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको बांधवगढ़ के इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।

राजा व्याघ्रदेव रीवा रियासत के महाराज द्वारा इसके निर्माण की जानकारी सामने आती है। इसका उल्लेख नारद-पंच और शिव पुराण में भी मिलता है। इस किले के अंदर जाने के लिए एक ही मार्ग है, जो घने जंगलों से होकर जाता है। इसके अंदर एक सुरंग बनी हुई थी जो सीधे रीवा निकलती थी।



राजा गुलाब सिंह और उनके पिता मार्तण्ड सिंह जुदेव इसका इस्तेमाल खूफिया किले के रूप में करते थे। यहां कई गुप्त रणनीतियां बनायीं जाती थीं। किले की सीमा में ही भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्रतिमाएं पत्थरों को तलाशकर बनाई गई हैं। इनमें कच्छप स्वरूप और शेष शैया पर आराम की मुद्रा में भी भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं।



कहते हैं कि भगवान राम ने लंका से लौटकर लक्ष्मण के लिए यहां एक किला बनवाया था। इसमें कितना सत्य और कितना मिथक है ये नही कहा जा सकता। अब किले के आस-पास जंगलों में टाइगर और दूसरे खतरनाक जानवर घूमते हैं। बताते हैं कि बांधवगढ़ में माघ, मौर्य, वाकाटक, सेंगर, कलचुरी और बघेलों ने राज किया।

Bandhavgarh fort




इस किले का इतिहास टीपू सुल्तान से जुड़ा होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि 6 माह के लगातार प्रयास के बाद भी वह इस पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था। यही नही यहां अंदर सात ऐसे तालाब हैं जो अब तक कभी भी सूखे नही हैं। किसी भी मौसम में इनमें पानी लबालब भरा रहता है। अब यहां की देखरेख शासन द्वारा की जाती है। घने जंगल और सघन मार्ग होने की वजह से अब किले के अंदर जाने पर रोक लगा दी गई है।


-पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम

👉#रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम 👉प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi बनारस से वर्चुअली करेंगे रीवा एयरपोर्ट ...