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Thursday, December 31, 2020

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER की तरफ से नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं (कैलेंडर 2021)

 आप सबको नमस्कार मैं नये साल के शुभ अवसर पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।  आप सब स्वस्थ रहे मस्त रहे।यही  भगवान से प्रार्थना करता हूं ।

नववर्ष 2021 का कैलेंडर VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER  ब्लॉग की तरफ से आप सबके लिए कैलेंडर  पोस्ट कर रहा हूँ। 

इस कैलेंडर में विंध्य क्षेत्र के धार्मिक स्थल एवं पर्यटक स्थल की फ़ोटो भी डाला गया है जिससे लोगों को विंध्य के धार्मिक स्थलों एवं पर्यटक स्थलों के बारें में जानकारी हो सके । 

कैलेंडर डाउनलोड करने के लिए लिंक-  https://drive.google.com/file/d/1gAhrWnGMOUGSJlZMnB0iZKELZxuHrgNe/view?usp=drivesdk

अभी तक आप लोगों ने हमारे ब्लॉग को इतना प्यार एवं सहयोग दिया है आशा करता हूं कि आप लोग आगे भी ऐसे ही प्यार एवं सहयोग देंगे।

धन्यवाद 🙏🙏



©Pankajdwivedi
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✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी , संचालक ब्लॉग

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER 

Saturday, October 24, 2020

माँ बिरासिनी देवी की जो मन से भक्ति करता है उसकी मनोकामना मईया पूरी करती है




10वी शताब्दी में कलचुरी काल के राजा वीर सिंह ने मंदिर का निर्माण किया था। विंध्य क्षेत्र के उमरिया जिले में स्थित बिरसिंहपुर पाली में माँ बिरासिनी देवी का भव्य मंदिर स्थापित है।


नवरात्रि के पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा हुआ है। माँ की भव्य आरती देख सुन कर ही चित्त में आत्म शुद्धि का अनुभव होता है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से मां की भक्ति करता है उसकी मनोकामना मैय्या पूरी करती हैं। माँ अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं।

बिरासिनी माता मंदिर बीरसिंहपुर  पाली | birasini mata mandir birsinghpur pali-

बिरासिनी मंदिर में आदिशक्ति स्वरूपा बिरासिनी माता की  10 वीं सदी की  कल्चुरी कालीन काले पत्थर से निर्मित भव्य मूर्ति विराजमान है | यह  पूरे भारत में  माता  काली की उन गिनी चुनी प्रतिमाओं में से एक है । मंदिर के गर्भ गृह में माता के  पास ही भगवान् हरिहर बिराजमान हैं जो आधे  भगवान्  शिव और आधे  भगवान्   विष्णु के रूप हैं | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं | मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण , मरही माता, भगवान् जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं | मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित  है |माता की  अलौकिक शक्तियों के कारण लोगों की मनोकामनाएं हमेशा पूरी होती हैं और यहां साल भर लोगों की भीड़ रहती है |

                                 


बिरासिनी माता मन्दिर से जुडी मान्यता -

मान्यतानुसार बिरासिनी माता ने सैंकड़ों वर्ष पूर्व पाली निवासी धौकल नामक व्यक्ति को सपना दिया कि उनकी मूर्ति एक खेत में है जिसे लाकर नगर में स्थापित करो | धौकल नामक व्यक्ति ने मूर्ति लाकर एक छोटी सी मढिया बनाकर माता को बिराजमान कराया | बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने एक मंदिर का निर्माण कराकर माता की स्थापना की | 



बिरासिनी माता  मंदिर का पुनर्निर्माण | Rebuilding Of Birasini Mata Temple -

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण का प्रारंभ जगतगुरु शंकराचार्य द्वारका  शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द  सरस्वती जी के पावन करकमलों द्वारा माघ शीर्ष कृष्ण पक्ष गुरुवार विक्रम संवत २०४६ ( दिनांक 23 नवम्बर 1989 ) को किया गया और बीरसिंहपुर कालरी /SECL/सभी दानदाताओं के सहयोग से लगभग सत्ताईस लाख रूपये में माता के संगमरमर के भव्य मंदिर पूर्ण हुआ | मंदिर का वास्तुचित्र , वास्तुकार श्री विनायक हरिदास NBCC नई दिल्ली द्वारा निशुल्क प्रदान किया गया |  बिरासिनी माता देवी मंदिर का जीर्णोद्धार का समापन कार्यक्रम , पुनः प्राण प्रतिष्ठा, कलश शिखर प्रतिष्ठा गुरूवार वैशाख शुक्र सप्तमी संवत् २०५६ (22 अप्रेल 1999 ) जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष से संपन्न हुआ |

माता बिरासिनी देवी के मंदिर परिसर में दो मुख्य प्रवेश द्वार है और एक द्वार पीछे के तरफ है | मंदिर पूरी तरह संगमरमर से निर्मित है | मंदिर के गर्भ गृह में माता बिरसिनी (काली माता)  बिराजमान हैं  | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर भी हैं | मंदिर के बाजू में मुंडन स्थल है | मुंडन स्थल के सामने ज्योति कलश स्थल है जो एक विशाल तलघर रूपी हाल है जिसमें नवरात्र में लोगों द्वारा हजारों घी और तेल के ज्योति कलशों की स्थापना की जाती है | मंदिर परिसर  में ही मंदिर का समिति  कार्यालय , छोटी धर्मशाला  और भण्डारा स्थल है |



नवरात्र और जवारा विसर्जन 

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के  मंदिर में वर्ष में दो बार शारदेय और चैत्र  में नवरात्र पूजा बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है | जिसमें ना केवल आस-पास के लोग अपितु देश-विदेश  से लोग अपनी मनोकामनायें मांगने के लिए आते हैं और मनोकामनायें पूरी होने पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं | नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है | यहां हजारों कि संख्या में घी,तेल और जवारे के कलश स्थापित किये जाते हैं | ज्योति कलश हेतु एक विशाल हाल की व्यवस्था है | जवारे हेतु दो मंजिला व्यवस्था की जाती है | श्रध्दालुओं द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने हेतु मंदिर प्रबंध संचालन समिति द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था की जाती है जिसमेंकोई भी व्यक्ति निश्चित राशि जमा करके घी जवारे कलश, तेल जवारे कलश , मनोकामना कलश,आजीवन घी जवारे कलश ,आजीवन तेल जवारे कलश स्थापित कर सकते हैं  | पूरे नवरात्र में मंदिर परिसर में बच्चो के मुंडन , कर्ण छेदन की व्यवस्था की जाती है | सांथ ही मंदिर समिति और अन्य लोगों द्वारा भण्डारे भी करवाये जाते हैं  और पुरे नौ दिन माता का श्रृंगार , भोग ,पूजा अर्चना बड़े ही श्रध्दा भक्ति से की जाती है | माता बिरासिनी के दरवार सोने-चांदी  के जेवरात सहित लाखो का चढ़ावा चढ़ाया जाता है |

बिरासिनी माता के जवारे विसर्जन बहुत ही प्रसिद्ध है जिसमें हजारों के संख्या  में महिला/पुरुष  जवारे विसर्जन में सम्मिलित होते हैं |


2 मंजिल में बोई जाती है ज्वार

जवारों और प्राचीन प्रतिमा को लेकर प्रसिद्ध इस मां बिरासिनी मंदिर में इस बार २७ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा सकते हैं। दो मंजिला में जवारों को बोया जाता है। अभी एक मंजिला पूरा जवारों से भर गया है।दूसरे मंजिल में भी जवारे बोने शुरू किया जाएगा। माता बिरासिनी के दरबार मे श्रद्धालुओ द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने के लिए मन्दिर प्रबन्ध संचालन समिति के द्वारा बेहतर व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही मंदिर परिसर में जवारे बोना शुरू कर दिया गया है। भक्तिमय माहौल के बीच जवारों का विसर्जन किया जाता है। इस साल भी १५ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा रहे हैं।


बीरसिंहपुर पाली कैसे पहुंचें | How to Reach Birsinghpur Pali - 

रेल मार्ग -   बीरसिंहपुर पाली बिलासपुर – कटनी ट्रेन रूट पर स्थित है | बीरसिंहपुर पाली स्टेशन से बिरसिनी माता मंदिर की दूरी 1/2 (आधा) किलोमीटर है |

सड़क मार्ग-  बीरसिंहपुर पाली  की सड़क मार्ग से जिला मुख्यालय उमरिया से दूरी- 40 किमी० ,शहडोल से दूरी- 38 किमी० ,नौरोजाबाद से -9 किमी० , डिन्डोरी से 77 किमी० , जबलपुर से 150 किमी० , अमरकंटक और बांधवगढ़ से दूरी क्रमशः 70 किमी० और 144 किमी० है | 

वायु मार्ग- निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर 150 किलोमीटर है |

#विंध्यप्रदेश , #विंध्य , #बिरासिनीमन्दिर 


-✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी, संचालक ब्लॉग
VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER

Friday, March 6, 2020

भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद आटिका महापर्व मुकुन्दपुर , विंध्यप्रदेश


मुकुंदपुर का आटिका महापर्व

रीवा राज्य के 25 वे महाराजा भाव सिंह जूदेव ने सन 1684-85 में पुरी (उड़ीसा) से भगवान जगन्नाथ जी ,बलभद्र एवं सुभद्रा माता की विशाल प्रतिमाएं स्थापित कराकर आटिका महाप्रसाद की परंपरा की सुरुआत की थी । कहा जाता है कि रीवा महाराजा स्वयं उपस्थित होकर यहाँ का महोत्सव संपन्न कराते थे किंतु बाद में आटिका महाप्रसाद की परंपरा बीच में बंद हो गयी थी । वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद मुकुंदपुर के स्थानीय निवासी  पंडित ब्रजवासी राम शुक्ल , बिहारीलाल गुप्त एवं मुखिया श्यामसुंदर त्रिपाठी ने एक आटिका कमेटी का गठन आसपास के ग्रामो का जनसहयोग लेकर पुनः विधिवत आटिका महाप्रसाद महोत्सव मनाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कराया तब से यह उत्सव निरंतर उत्तरोत्तर विकासोंन्मुख है ।
फाल्गुन की पूर्णमासी एवं चैत्र मास की प्रतिपदा को दो दिवसीय इस महोत्सव में यहाँ मेला लगता है । भक्त प्रहलाद के नाटक के साथ विविध मनोरंजक कार्यक्रम होते है तथा दोपहर 12 बजे भगवान को भोग लगाने के बाद आटिका महाप्रसाद का वितरण प्रारम्भ होता है जो रात्रि 12 बजे तक चलता है ।

अब आटिका महाप्रसाद चढाने का जिम्मा व्यक्तिशः हो गया है। धनी -मानी लोग प्रबंधन समिति में आवेदन लगाकर इसका पूरा खर्च उठा लेते है ।
इस वर्ष 10 मार्च 2020 को आटिका महाप्रसाद महापर्व मनाया जायेगा जिसमे आटिका महाप्रसाद चढाने का सौभग्य मुकुंदपुर के श्री दया गुप्ता पिता स्व. यज्ञनारायण गुप्ता को प्राप्त हुआ है । इसके पूर्व प्रबंधन समिति के सहयोग से दिनाँक 2 मार्च 2020 से साप्ताहिक भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ भी आयोजित किया गया है ।


व्यक्तिशः आटिका महाप्रसाद चढ़ाने वालो की सूची -

1. श्री शिवदीन गुप्ता सतना वर्ष 1952
2. श्री हीरालाल चिकवा मुकुंदपुर वर्ष-1982
3. श्री रामनिवास गुप्ता रामनगर वर्ष- 1989,90,93,95
4. श्रीमती लल्ली देवी पति सौखिलाल  गुढ़  वर्ष-1996
5. श्री गंगा प्रसाद गुप्ता रामपुर नैकिन  वर्ष- 1997
6. साधूलाल गुप्ता रायपुर कर्चुलियान वर्ष-1998
7.बघेल परिवार जमुना,कस्तरा, सुकुलगंवा  वर्ष -1999
8. विजयकुमार गुप्त हिनौती (सतना) वर्ष-2000,2001,2002
9.गंगा सिंह बुढगौना (सीधी)वर्ष- 2003
10. बद्री प्रसाद त्रिपाठी मुकुंदपुर  वर्ष- 2004
11. मंदिर प्रबंधन समिति मुकुंदपुर , वर्ष- 2005
12. रामाधार गुप्ता न्यू रामनगर , वर्ष-2006
13. जगदीश प्रसाद गुप्ता कोठीवाल सीधी , वर्ष-2007
14. महादेव प्रसाद तिवारी मुकुंदपुर , वर्ष-2008
15. डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह (पूर्वमंत्री) अमरपाटन, वर्ष-2009
16.बघेलपरिवर जमुना, कस्तरा,शुक्लगवाँ वर्ष 2010
17.बड़ा अखाडा मैहर +प्रतीक त्रिपाठी मुकुंदपुर , वर्ष -2011
18.सुरेंद्र ताम्रकार (पान वाले ) फोर्ट रोड रीवा, वर्ष-2012
19.मुन्नालाल गुप्ता रिमड़ा अमरपाटन, वर्ष-2013
20.हनुमान समिति कृष्णम भइया भीषमपुर, वर्ष-2014
21.श्रीमती रामसखी पत्नी रामहित्त गुप्त सतना,वर्ष-2015
22.जयपाल सिंह तिवारी मढ़ी मुकुंदपुर, वर्ष 2016
23. धर्मेंद्र सिंह तिवारी मढ़ी (मुकुंदपुर) वर्ष-2017
24. हरीश त्रिपाठी नकटी(वर्तमान- नायनपुर) , वर्ष-2018
25.मोहन लाल ताम्रकार , वर्ष-2019
26.दया गुप्ता  मुकुंदपुर , वर्ष-2020

2030 तक आटिका की बुकिंग-

श्री जगन्नाथ मंदिर मुकुंदपुर की आस्था का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2030 तक आटिका प्रसाद की बुकिंग हो चुकी है । अगर कोई चाहे इससे पहले आटिका चढ़ता तो होली के फगुआ के दिन तो संभव नहीं है। इसके लिए पूर्णिमा का विकल्प रखा गया है ।
जगन्नाथ भगवान के आटिका का महाप्रसाद लेने   बड़ी दूर-दूर से लोग आते  है रीवा,सतना, सीधी,सिंगरौली ,शहडोल,गोविन्दगढ़,मैहर, इतियादि जगह से आते है


✍✍✍✍----- पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग- Vindhya pradesh the land of white tiger

Sunday, October 7, 2018

शारदा माता मैहर इतिहास

मैहर



देवी माँ शारदा मंदिर

शारदा मन्दिर से आल्हा-उदल जलाशय
मैहर मध्यप्रदेश के सतना जिले का एक छोटा सा नगर है। यह एक प्रसिद्ध  हिन्दू तीर्थस्थल है। मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर ह जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्तिपीठो में से एक है। यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हाखंड के नायक आल्हा व उदल
दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है।
यहाँ प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रो
 में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं। मां शारदा के बगल में प्रतिष्ठापित नरसिंहदेव जी की पाषाण मूर्ति आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है।
देवी शारदा का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थल देश के लाखों भक्तों के आस्था का केंद्र है माता का यह मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक है

उत्पत्ति

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ब्रम्हा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह स्वयम्भुव मनु की पुत्री प्रसूति से हुआ था। प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि देव के साथ, स्वधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।

सती का जन्म, विवाह तथा दक्ष-शिव-वैमनस्य

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दक्ष के प्रजापति बनने के बाद ब्रह्मा ने उसे एक काम सौंपा जिसके अंतर्गत शिव और शक्ति का मिलाप करवाना था। उस समय शिव तथा शक्ति दोनों अलग थे। इसीलिये ब्रह्मा जी ने दक्ष से कहा कि वे तप करके शक्ति माता (परमा पूर्णा प्रकृति जगदम्बिका) को प्रसन्न करें तथा पुत्री रूप में प्राप्त करें। तपस्या के उपरांत माता शक्ति ने दक्ष से कहा,"मैं आपकी पुत्री के रूप में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी। जब आप की तपस्या का पुण्य क्षीण हो जाएगा और आपके द्वारा मेरा अनादर होगा तब मैं अपनी माया से जगत् को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी। इस प्रकार सती के रूप में शक्ति का जन्म हुआ।
प्रजापति दक्ष का भगवान् शिव से मनोमालिन्य होने के कारण रूप में तीन मत हैं। एक मत के अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मा के पाँच सिर थे। ब्रह्मा अपने तीन सिरों से वेदपाठ करते तथा दो सिर से वेद को गालियाँ भी देते जिससे क्रोधित हो शिव ने उनका एक सिर काट दिया। ब्रह्मा दक्ष के पिता थे। अत: दक्ष क्रोधित हो गया और शिव से बदला लेने की बात करने लगा। लेकिन यह मत अन्य प्रामाणिक संदर्भों से खंडित हो जाता है। श्रीमद्भागवतमहापुराण में स्पष्ट वर्णित है कि जन्म के समय ही ब्रह्मा के चार ही सिर थे।
दूसरे मत के अनुसार शक्ति द्वारा स्वयं भविष्यवाणी रूप में दक्ष से स्वयं के भगवान शिव की पत्नी होने की बात कह दिये जाने के बावजूद दक्ष शिव को सती के अनुरूप नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने सती के विवाह-योग्य होने पर उनके लिए स्वयंवर का आयोजन किया तथा उसमें शिव को नहीं बुलाया। फिर भी सती ने 'शिवाय नमः' कहकर वरमाला पृथ्वी पर डाल दी और वहाँ प्रकट होकर भगवान् शिव ने वरमाला ग्रहण करके सती को अपनी पत्नी बनाकर कैलाश चले गये। इस प्रकार अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी पुत्री सती द्वारा शिव को पति चुनने के कारण दक्ष शिव को पसंद नहीं करते थे।
तीसरा मत सर्वाधिक प्रचलित है। इसके अनुसार प्रजापतियों के एक यज्ञ में दक्ष के पधारने पर सभी देवताओं ने उठकर उनका सम्मान किया, परंतु ब्रह्मा जी के साथ शिवजी भी बैठे ही रहे। शिव को अपना जामाता अर्थात् पुत्र समान होने के कारण उनके द्वारा खड़े होकर आदर नहीं दिये जाने से दक्ष ने अपना अपमान महसूस किया और उन्होंने शिव के प्रति कटूक्तियों का प्रयोग करते हुए अब से उन्हें यज्ञ में देवताओं के साथ भाग न मिलने का शाप दे दिया। इस प्रकार इन दोनों का मनोमालिन्य हो गया।

सती का आत्मदाह

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उक्त घटना के बाद प्रजापति दक्ष ने अपनी राजधानी कनखल में एक विराट यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपने जामाता शिव और पुत्री सती को यज्ञ में आने हेतु निमंत्रित नहीं किया। शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता के उस यज्ञ में बिना बुलाये ही चली गयी। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान् शंकर ने बीरभद्र को उत्पन्न कर उसके द्वारा उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। वीरभद्र ने पूर्व में भगवान् शिव का विरोध तथा उपहास करने वाले देवताओं तथा ऋषियों को यथायोग्य दण्ड देते हुए दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर भगवान् शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।

दक्ष-यज्ञ-विध्वंस : कथा-विकास के चरण

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दक्ष-यज्ञ-विध्वंस की कथा के विकास के स्पष्टतः तीन चरण हैं। इस कथा के प्रथम चरण का रूप महाभारत के शांतिपर्व में है। कथा के इस प्राथमिक रूप में भी दक्ष का यज्ञ कनखल में हुआ था इसका समर्थन हो जाता है। यहाँ कनखल में यज्ञ होने का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं है, परंतु गंगाद्वार के देश में यज्ञ होना उल्लिखित है और कनखल गंगाद्वार (हरिद्वार) के अंतर्गत ही आता है। इस कथा में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस तो होता है परंतु सती भस्म नहीं होती है। वस्तुतः सती कैलाश पर अपने पति भगवान शंकर के पास ही रहती है और अपने पिता दक्ष द्वारा उन्हें निमंत्रण तथा यज्ञ में भाग नहीं दिये जाने पर अत्यधिक व्याकुल रहती है। उनकी व्याकुलता के कारण शिवजी अपने मुख से वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं और वह गणों के साथ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डालता है। परंतु, न तो वीरभद्र दक्ष का सिर काटता है और न ही उसे भस्म करता है। स्वाभाविक है कि बकरे का सिर जोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता है। वस्तुतः इस कथा में 'यज्ञ' का सिर काटने अर्थात् पूरी तरह 'यज्ञ' को नष्ट कर देने की बात कही गयी है, जिसे बाद की कथाओं में 'दक्ष' का सिर काटने से जोड़ दिया गया। इस कथा में दक्ष 1008 नामों के द्वारा शिवजी की स्तुति करता है और भगवान् शिव प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं।
इस कथा के विकास के दूसरे चरण का रूप श्रीमद्भागवत महापुराण से लेकर शिव पुराण तक में वर्णित है। इसमें सती हठपूर्वक यज्ञ में सम्मिलित होती है तथा कुपित होकर योगाग्नि से भस्म भी हो जाती है। स्वाभाविक है कि जब सती योगाग्नि में भस्म हो जाती है तो उनकी लाश कहां से बचेगी ! इसलिए उनकी लाश लेकर शिवजी के भटकने आदि का प्रश्न ही नहीं उठता है। ऐसा कोई संकेत कथा के इस चरण में नहीं मिलता है। इस कथा में वीरभद्र शिवजी की जटा से उत्पन्न होता है तथा दक्ष का सिर काट कर जला देता है। परिणामस्वरूप उसे बकरे का सिर जोड़ा जाता है।
कथा के विकास के तीसरे चरण का रूप देवीपुराण (महाभागवत) जैसे उपपुराण में वर्णित हुआ है। जिसमें सती जल जाती है और दक्ष के यज्ञ का वीरभद्र द्वारा विध्वंस भी होता है। यहाँ वीरभद्र शिवजी के तीसरे नेत्र से उत्पन्न होता है तथा दक्ष का सिर भी काटा जाता है। फिर स्तुति करने पर शिव जी प्रसन्न होते हैं और दक्ष जीवित भी होता है तथा वीरभद्र उसे बकरे का सिर जोड़ देता है। परंतु, यहाँ पुराणकार कथा को और आगे बढ़ाते हैं तथा बाद में भगवान शिव को पुनः सती की लाश सुरक्षित तथा देदीप्यमान रूप में यज्ञशाला में ही मिल जाती है। तब उस लाश को लेकर शिवजी विक्षिप्त की तरह भटकते हैं और भगवान् विष्णु क्रमशः खंड-खंड रूप में चक्र से लाश को काटते जाते हैं। इस प्रकार लाश के विभिन्न अंगों के विभिन्न स्थानों पर गिरने से 51 शक्ति पीठों का निर्माण होता है। स्पष्ट है कि कथा के इस तीसरे रूप में आने तक में सदियों या सहस्राब्दियों का समय लगा होगा।

शक्तिपीठसंपादित करें

इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किये आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ
अस्तित्व में आ गये। शक्तिपीठों की संख्या विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न बतायी गयी है। तंत्रचूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गयी है। देवीभागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है, तो देवीगीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गयी है। परम्परागत रूप से भी देवीभक्तों और सुधीजनों में 51 शक्तिपीठों की विशेष मान्यता है।
यह कहा जाता है कि जब शिव मृत देवी माँ के शरीर ले जा रहे थे, उनका हार इस जगह पर गिर गया और इसलिए नाम मैहर (मैहर = माई का हार ) पड़ गया . एक कहानी यह भी है कि भगवती सती का उर्ध्व ओष्ठ यहां गिरा था।

इतिहास

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मैहर इतिहास Paleolithic आयु के बाद से पता लगाया जा सकता है। शहर के पूर्व में मैहर रियासत की राजधानी थी। राज्य 1778 में कुशवाहा कबीले के राजपूतों, जो ओरछा के पास राज्य के शासक द्वारा दी गई भूमि पर स्थापित किया गया। राज्य में जल्दी 19 वीं सदी में ब्रिटिश भारत के एक राजसी राज्य बना था और बुंदेलखंड एजेंसी के मध्य भारत एजेंसी में भाग के रूप में दिलाई. 1871 में बुंदेलखंड के पूर्वी राज्यों, मैहर सहित, मध्य भारत में बगेलखंड की नई एजेंसी फार्म अलग हो गए थे। 1933 मैहर में, दस अन्य राज्यों के साथ साथ पश्चिमी बगेलखंड में, वापस बुंदेलखंड एजेंसी को हस्तांतरित किया गया। राज्य 407 वर्ग मील के एक क्षेत्र है और 1901 में 63,702 की आबादी थी। राज्य है, जो टोंस नदी से पानी पिलाया था जलोढ़ मिट्टी के बलुआ पत्थर को कवर मुख्य रूप से शामिल है और दक्षिण के पहाड़ी जिले में छोड़कर उपजाऊ है। एक बड़े क्षेत्र में वन के तहत किया गया, जिसमें से एक छोटे से उत्पादन निर्यात व्यापार प्रदान की है। शासक का शीर्षक महाराजा था। राज्य अकाल से 1896-1897 में गंभीर रूप से सामना करना पड़ा. मैहर ईस्ट इंडियन रेलवे (अब पश्चिम मध्य रेलवे) सतना और जबलपुर, 97 मील की दूरी पर जबलपुर के उत्तर के बीच लाइन पर एक स्टेशन बन गया। मंदिरों और अन्य भवनों का व्यापक खंडहर शहर के चारों ओर फैला है। 

शारदा देवी मंदिर

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मैहर में शारदा देवी मंदिर से ऊपर के अलावा वहाँ शारदा देवी मंदिर के नाम पर एक शहर के दिल से 5 किमी के आसपास त्रिकुटा पहाड़ी की चोटी पर स्थित द्वारा एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदि दर्शनों की
वहाँ एक शारदा देवी की पत्थर की मूर्ति के पैर शारदा देवी मंदिर के पास में स्थित प्राचीन शिलालेख है। वहाँ शारदा देवी के साथ भगवान नरसिंह की एक मूर्ति है। इन मूर्तियों Nupula देवा द्वारा शेक 424 चैत्र कृष्ण पक्ष पर 14 मंगलवार, विक्रम संवत् 559 अर्थात 502 ई. स्थापित किया गया। चार पंक्तियों में इस पत्थर शिलालेख शारदा देवी देवनागरी लिपि में "3.5 से" 15 आकार की है। मंदिर में एक और पत्थर शिलालेख एक शैव संत Shamba जो बौद्ध धर्म और जैन धर्म का भी ज्ञान था द्वारा 34 "31" आकार का खुदा होता है। इस शिलालेख नागदेव के एक दृश्य भालू और पता चलता है कि यह दामोदर , सरस्वती के बेटे के बारे में थी, कलियुग का व्यास माना जाता है। और यह है कि पूजा के दौरान उस समय बकरी बलिदान की व्यवस्था चली. स्थानीय परंपरा का पता चलता है कि योद्धाओं आल्हा और उदल, जो पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध किया था इस जगह के साथ जुड़े रहे हैं। दोनों भाई शारदा देवी के बहुत मजबूत अनुयायी थे। कहा जाता है कि आल्हा 12 साल के लिए penanced और शारदा देवी के आशीर्वाद स अर्मत्व है। आल्हा और उदल करने के लिए इस दूरदराज के जंगल में देवी की यात्रा पहले कहा जाता है। आल्हा को नाम 'शारदा माई' द्वारा देवी माँ कह कर बुलाते थे और अब वह 'के रूप में माता शारदा माई' लोकप्रिय हो गया। एक नीचे मंदिर, के रूप में 'आल्हा तालाब' ज्ञात तालाब के पीछे पहाड़ी देख सकते हैं। हाल ही में इस तालाब और आसपास के क्षेत्रों में साफ किया गया है / तीर्थयात्रियों के हित के लिए rennovated. इस तालाब से 2 किलोमीटर की दूरी पर आल्हा औरउदल जहां वे कुश्ती का अभ्यास किया था के अखाड़े स्थित है। 

भूगोल

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मैहर 24.27 ° N 80.75 ° E में स्थित है। यह 367 मीटर (1204 फीट) की एक औसत ऊंचाई है।

जनसांख्यिकी

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2001 भारत की जनगणना के रूप में  मैहर 34,347 की आबादी थी। पुरुषों की आबादी और 48% महिलाओं की 52% का गठन. मैहर 64% की एक औसत साक्षरता दर 59.5% के राष्ट्रीय औसत से अधिक: पुरुष साक्षरता 72% है और महिला साक्षरता 56% है। मैहर में, जनसंख्या का 15% age.and के 6 साल के अंतर्गत है

परिवहन

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मैहर अच्छी तरह से आवागमन के माध्यमों से जुड़ा हुआ है। यह दोनों प्रमुख माध्यम रेल मार्ग और सड़क मार्ग 7 एन एच (राष्ट्रीय राजमार्ग) से जुड़ा हुआ है। महाकौशल एक्सप्रेस दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से प्रतिदिन सीधा संबंध जोड़ता है। महाकौशल ट्रेन हजरत निजामुद्दीन स्टेशन और जबलपुर स्टेशन के बीच चलती है जबलपुर स्टेशन 162 किलोमीटर मैहर से दूर स्थित है। मैहर रेलवे स्टेशन पश्चिम मध्य रेलवे के कटनी और सतना स्टेशनों के बीच में स्थित है। नवरात्रि त्योहार के दौरान वहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। इसलिए इन दिनों के दौरान अप और डाउन के सभी ट्रेने यात्रियों की सुविधा के लिए मैहर में रूकती है। मैहर आप बांधवगढ़ से भी पहुँच सकते है बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान सिर्फ 90 किलोमीटर की दूरी पर है अतः आप बांधवगढ़ स्टेशन का उपयोग कर सकते हैं। निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर और रीवा हैं।

उद्योग

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वहाँ एक 3.1 करोड़ तमिलनाडु सीमेंट कारखाने के पास भी मैहर है (मैहर सीमेंट फैक्ट्री ), जो पवित्र स्थान के लिए एक औद्योगिक स्पर्श प्रदान करता है। कारखाना परिसर और बस्ती Sarlanagar पर स्थित है के बारे में 8 किलोमीटर मैहर-Dhanwahi रोड पर मैहर शहर से दूर. एनटीपीसी भारत की शक्ति विशाल भी स्थापित कर रहा है Mahiyar मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में जिले में Barethi में एक थर्मल संयंत्र.

संस्कृति

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मैहर घरानासंपादित करें

मैहर, हिंदुस्तानी संगीत की एक घराना (स्कूल या शैली) का जन्मस्थान के रूप में एक भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक प्रमुख स्थान है। भारतीय शास्त्रीय संगीत उस्ताद अलाउद्दीन खान (1972 मृत्यु हो गई) की सबसे बड़ी दिग्गज लंबे समय के लिए यहां रहते थे और मैहर के महाराजा पैलेस के दरबार संगीतकार और उसकी छात्रों श्रीमती अन्नपूर्णा (अलाउद्दीन खान की बेटी) देवी, उस्ताद अली अकबर खान (अलाउद्दीन खान के पुत्र), पंडित [[रवि (संगीतकार) शंकर, उस्ताद आशीष खान (अलाउद्दीन खान के पोते), उस्ताद Dhyanesh खान (अलाउद्दीन खान 2 पोता), उस्ताद प्रणेश खान (अलाउद्दीन खान के पोते 3), उस्ताद बहादुर खान (अलाउद्दीन खान के भतीजे), Timir बारां भट्टाचार्य (अलाउद्दीन खान के पहले छात्र) पं.. Indranil (Timir बारां भट्टाचार्य के पुत्र) भट्टाचार्य, वसंत राय पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बनर्जी (अलाउद्दीन खान के छात्रों) (अलाउद्दीन खान की अंतिम छात्र) 20 वीं century.The पहले उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत सम्मेलन में श्री शैली थी द्वारा आयोजित लोकप्रिय 1962in में दीप चंद इस सम्मेलन कलाकारों अली अकबर, pt रवि शंकर, राम नारायण पीटी, पीटी shantaprasad, निखिल बनर्जी pt उस्ताद था जैन, सरन रानी, एमएस pt जोग VG आदि

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