Monday, November 25, 2019

बांधवगढ़: शयन मुद्रा में भगवान विष्णु


ये है शिवपुराण का रहस्यमयी पहाड़
सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।


अब तक आपने भगवान विष्णु की अनेक प्रतिमाएं देखी होंगी। क्षीर सागर में विश्राम मुद्रा में उनका स्वरूप कम ही देखने मिलता है। आज हम आपको ऐसे ही स्थान पर ले जा रहे हैं। जो है तो एक किले में लेकिन राष्ट्रीय उद्यान के लिए पहचाना जाता हैै। भगवान विष्णु की विशालकाय प्रतिमा अति आकर्षक एवं रहस्यात्मक है। मध्यप्रदेश उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ में। जिसे आमतौर पर लोग नेशनल पार्क के लिए जानते हैं। इस अद्भुत किले बांधवगढ़ का नाम यहां मौजूद एक पहाड़ के नाम पर ही रखा गया है और इस पहाड़ पर ही स्थित है ये रहस्यमयी किला जिसका निर्माण करीब 2 हजार साल पहले कराया गया था। सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको बांधवगढ़ के इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।

राजा व्याघ्रदेव रीवा रियासत के महाराज द्वारा इसके निर्माण की जानकारी सामने आती है। इसका उल्लेख नारद-पंच और शिव पुराण में भी मिलता है। इस किले के अंदर जाने के लिए एक ही मार्ग है, जो घने जंगलों से होकर जाता है। इसके अंदर एक सुरंग बनी हुई थी जो सीधे रीवा निकलती थी।



राजा गुलाब सिंह और उनके पिता मार्तण्ड सिंह जुदेव इसका इस्तेमाल खूफिया किले के रूप में करते थे। यहां कई गुप्त रणनीतियां बनायीं जाती थीं। किले की सीमा में ही भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्रतिमाएं पत्थरों को तलाशकर बनाई गई हैं। इनमें कच्छप स्वरूप और शेष शैया पर आराम की मुद्रा में भी भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं।



कहते हैं कि भगवान राम ने लंका से लौटकर लक्ष्मण के लिए यहां एक किला बनवाया था। इसमें कितना सत्य और कितना मिथक है ये नही कहा जा सकता। अब किले के आस-पास जंगलों में टाइगर और दूसरे खतरनाक जानवर घूमते हैं। बताते हैं कि बांधवगढ़ में माघ, मौर्य, वाकाटक, सेंगर, कलचुरी और बघेलों ने राज किया।

Bandhavgarh fort




इस किले का इतिहास टीपू सुल्तान से जुड़ा होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि 6 माह के लगातार प्रयास के बाद भी वह इस पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था। यही नही यहां अंदर सात ऐसे तालाब हैं जो अब तक कभी भी सूखे नही हैं। किसी भी मौसम में इनमें पानी लबालब भरा रहता है। अब यहां की देखरेख शासन द्वारा की जाती है। घने जंगल और सघन मार्ग होने की वजह से अब किले के अंदर जाने पर रोक लगा दी गई है।


-पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

Sunday, November 24, 2019

देउर कोठार : जहा 2 हजार साल प्राचीन बौद्ध स्तूपो और 5 हजार साल प्राचीन शैल चित्रों की श्रृंखला

रीवा। देउर कोठार का नाम केवल देश के इतिहासकार ही नहीं लेते हैं बल्कि विदेशों में भी इसका पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व है। यहां लगभग 2 हजार वर्ष पुराने बौद्ध स्तूप और लगभग 5 हजार वर्ष प्राचीन शैलचित्रों की श्रृंखला मौजूद है। जो 1982 में प्रकाश में आए थे। ये स्तूप सम्राट अशोक के शासनकाल में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के निर्मित हैं।
देउर कोठार स्थान, रीवा-इलाहाबाद मार्ग एचएन-27 पर सोहागी पहाड़ से पहले कटरा कस्बे के समीप स्थित है। यहां मौर्य कालीन मिट्टी ईट के बने 3 बड़े स्तूप और लगभग 46 पत्थरों के छोटे स्तूप बने है। अशोक युग के दौरान विंध्य क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ और भगवान बौद्ध के अवशेषों को वितरित कर स्तूपों का निर्माण किया गया।

बौद्ध स्तूपों की सबसे बड़ी श्रंखला
देउर कोठार के बौद्ध स्तूपों का समूह सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप समूह है जिसमें पहला बौद्ध स्तूप ईंटों द्वारा बनाया गया था। एक मौर्यकालीन स्तम्भ भी है जिसमें एक शिलालेख भी है जिसकी शुरुआत भगवतोष् से होती है। पुरातत्ववेत्ता नारायण व्यास बताते हैं कि देउर कोठार में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई कराई जा रही थी। जिनकी टीम में वो भी शामिल थे। जिसमें उन्हें मन्नत शिलालेखों के साथ साथ कुछ रेलिंग के टुकड़े भी मिले थे। देउर कोठार पर आधारित एक पुस्तिका का भी प्रकाशन हुआ है।

कभी यहां से था व्यापारिक मार्ग
 यह क्षेत्र कौशाम्बी से उज्जैनी अवंतिका मार्ग तक जाने वाला दक्षिणपक्ष का व्यापारिक मार्ग था। इसी वजह से बौद्ध के अनुयायियों ने यहां पर स्तूपों का निर्माण किया होगा। ऐसा कहा जाता है कि देउर कोठार में भरहुत से अधिक प्राचीन स्तूप है। यहां बौद्ध भिक्षू अत्यात्मिक स्थल बनाकर शिक्षा-दिक्षा और साधना करते रहे होगें। इसके प्रमाण यहां मिलते है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों का विंध्य क्षेत्र शिक्षण केन्द्र था। इसके प्रमाण देउर कोठार मे मिलते है। यहां पर खुदाई के दौरान मौर्य कालीन ब्राही लेख के अभिलेख, शिलापट्ट स्तंभ और पात्रखंड बडी संख्या में मिले।
यहां से आते हैं बौद्ध धर्मावलम्बी
श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, भूटान, थाईलैंड, चीन आदि जैसे देशों से बौद्ध धर्मावलम्बी भारी संख्या में देउर कोठार आते हैं। वो सबसे ज्यादा बौद्ध स्तूपों को ही देखना पसंद करते हैं और उन पर शोध भी करते हैं। देउर कोठार सहित सतना में भरहुत, मानपुर के बौद्ध स्तूपों को राष्ट्रीय बौद्ध टूरिज्म सर्किट में शामिल किए जाने की चर्चा है। अगर ऐसा होता है तो इन देशों के बौद्ध धर्मावलम्बी की संख्या बढ़ेगी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

- पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
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Wednesday, November 13, 2019

TAMRA Rewa

TAMRA REWA-
 Tamra is a village in huzur tehsil,Rewa district madhya pradesh india.its a Rewa division,located 12 km south of Rewa city by Nipania-Tamra Road,satna 51 km to the east of district and 478 km from the state capital bhopal.tamra pincode is 486006.the head post office is at chorahta.

The nearest village are bansi(2km),amiri ti(3km),mukundpur(1.5km),govind garh(10km),rausar(6km),nipaniya(11 km),

The nearest cities are Rewa,satna,sidhi,singrauli,shahdol, allhabad,govindgarh,maihar,chitrakoot etc. The local language are hindi and bagheli

TOURIST PLACE
1. Padui hanuman mandir Tamra

2. Devi dai mata mandir

3.world first  White tiger safari mukundpur(near1.5 km)


Saturday, September 14, 2019

सफेद बाघ मोहन ने दी विंध्य को नई पहचान



बाघों की प्रजाति में सफेद बाघों की अपनी अलग पहचान है। दुनिया में वर्तमान में जहां भी सफेद बाघ हैं, उन सबका डीएनए विंध्य और रीवा से जुड़ा हुआ है। पहला जीवित सफेद बाघ मोहन के रूप में पकड़े जाने का दावा है। बात 27 मई 1951 की है जब सीधी जिले के कुसमी क्षेत्र के पनखोरा गांव के नजदीक जंगल में बाघिन का शिकार करने महाराजा मार्तण्ड सिंह के साथ शाही मेहमान जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह पहुंचे थे। तीन शावक तो जंगल की ओर भाग गए लेकिन सफेद रंग वाला वहीं पर एक गुफा में छिप गया। जिसे मारने के बजाय मार्तण्ड सिंह ने पकडऩे की योजना बनाई। पिंजड़ा लगाकर उसे पकड़ा गया। मोहन को पकडऩे से लेकर आखिरी सांस तक के केवल एक ही गवाह के रूप में पुलुआ बैरिया बचे हैं।
पुलुआ बताते हैं कि बात 1951 की है, जब महाराजा मार्तण्ड सिंह गोविंदगढ़ किले में बाघ को लेकर आए। पूरा क्षेत्र देखने के लिए उमड़ रहा था, मैं भी बालक था तो सबके साथ गया। परिवार के कुछ लोग किले में काम करते थे, वह जब बाघ को भोजन देने के लिए जाते तो मैं भी नजदीक से देखने की उत्सुकता के लिए जाता। कम उम्र का होने के चलते बाघ की नजर हमारी तरफ अधिक रहती थी। महाराजा को पता चला तो उन्होंने हमारी ड्यूटी ही मोहन की सेवा में लगा दी। उसके बाद से लगातार सेवाएं देते रहे। बाघ का नाम मोहन रखा गया, वह जंगल का राजा होता है तो हम सब राजा की तरह ही उसे सम्मान देते थे।
जितने केयर टेकर थे, सब मोहन सिंह इधर आइए-मोहन सिंह उधर जाइए, इस तरह की सम्मानित भाषा का प्रयोग करते थे। हम सब के अलावा मोहन किसी को नजदीक से जानते थे तो वह थे महाराजा मार्तण्ड सिंह। अक्सर दोपहर के बाद महाराजा फुटवाल लेकर मोहन के बाड़े के पास पहुंचते थे। ऊपर छत पर बैठकर वह बाड़े की दीवाल की ओर बाल फेंकते तो मोहन उसे पकडऩे के लिए दौड़ते थे। यह दृश्य बहुत ही आकर्षक होता था। कई बार तो ऐसे भी अवसर आए जब महाराजा ने मोहन के नजदीक तक जाकर सिर पर हाथ फेरा। सुबह नौ बजे मांस देने का समय होता था, इसमें थोड़ा सा भी विलंब होने पर मोहन दहाड़ लगा देते, मतलब पूरा किला सक्रिय हो जाता था।
रविवार के दिन मोहन खाना नहीं खाते थे, शुरुआत में इसे सामान्य रूप में लिया गया लेकिन जब लगातार वह उस दिन मांस देने के बाद नहीं खाते थे, तो महाराजा ने कहा कि इस दिन मांस नहीं दिया जाए। इसके बाद से दो लीटर दूध उस दिन दिया जाने लगा। बाद में बीमार होने पर इंग्लैंड के डॉ. वेल्सन ने लंबे समय तक देखरेख की और उन्होंने नए सिरे से आहार की मात्रा निर्धारित की थी। एक बार तो दूसरे केयर टेकर ने बाड़े के भीतर जाने वाले दरवाजे को बंद ही नहीं किया, भोजन देने की तैयारी चल रही थी कि मोहन उसी स्थान पर आकर खड़े हो गए, पीछे से उनके छूने का एहसास हुआ तो एक झटके में मन दहशत में भर गया। लेकिन कोई हरकत किए बिना इशारा किया कि बाड़े में चालिए, तो वह चले गए। अन्यथा बाहर निकलने का रास्ता खुला था, उस दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता था। मौत से कुछ समय पहले मोहन के पैर में उनके लकवा मार गया था। हम सब आखिर तक देखरेख करते रहे। 10 दिसंबर 1969 को मोहन का निधन हो गया, वह जीवन का सबसे बड़ा सदमा था, जिसे आज तक नहीं भूला। कोई भी सफेद बाघ देखता हूं तो मोहन की याद ताजा हो जाती है।


मुकुंदपुर में ली शरण
पुलुआ बताते हैं कि गोविंदगढ़ किले में मोहन को रखे दो दिन का ही समय हुआ था कि रात्रि में दीवाल फांदकर वह भाग निकले। महाराजा ने चारों ओर तलाश कराई तो मुकुंदपुर के मांद रिजर्व क्षेत्र के जंगल में मिले। वह क्षेत्र बाघों के लिए प्रिय माना जाता है, अब वहीं पर टाइगर सफारी और चिडिय़ाघर बना दिया गया है। इसके पहले अन्य बाघ भी इस क्षेत्र में रहते थे।

राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
मोहन की मौत की जानकारी देते समय केयर टेकर पुलुआ की भी आंखें भर आई। उन्होंने बताया कि उस दिन रीवा में राजकीय शोक घोषित किया गया था। बांधवगद्दी के राजसी ध्वज में पार्थिव शरीर ढंका गया। बंदूकें झुकाकर सलामी दी गई। पुलुआ के अनुसार उस दिन महाराजा मार्तण्ड सिंह ने कहा था कि आज हमने अपनी बहुमूल्य धरोहर खो दी है। मौत के कई घंटे तक महाराजा एकांत में रहे। कहा जाता है कि किसी बाघ या अन्य जानवर को मरने के बाद इस तरह सम्मान इसके पहले और अब तक नहीं मिला है। कई दिनों तक शोक सभाएं हुई।

मोहन का सफर
27 मई 1951 को सीधी जिले के कुसमी क्षेत्र के पनखोरा गांव के नजदीक जंगल में पकड़ा गया। सफेद शावक मोहन को गोविंदगढ़ किले में रखा गया। 1955 में पहली बार सामान्य बाघिन के साथ ब्रीडिंग कराई गई, जिसमें एक भी सफेद शावक नहीं पैदा हुए। 30 अक्टूबर 1958 को मोहन के साथ रहने वाली राधा नाम की बाघिन ने चार शावक जन्मे, जिनका नाम मोहिनी, सुकेशी, रानी और राजा रखा गया। 19 वर्षों तक जिंदा रहे तीन मादाओं के साथ मोहन के संसर्ग गोविंदगढ़ में लगातार सफेद शावक पैदा होते गए। मोहन से कुल 34 शावक जन्मे, जिसमें 21 सफेद थे। इसमें 14 राधा अकेले नाम की बाघिन के थे। गोविंदगढ़ किले में 6 सितंबर 1967 को मोहन और सुकेशी से चमेली जन्मी और 17 नवंबर 1968 को विराट नाम का सफेद शावक जन्मा। 10 दिसंबर 1969 को मोहन की मौत के बाद गोविंदगढ़ किला परिसर में ही राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। 1972 में मोहन की मौत के बाद सुकेशी नाम की बाघिन को दिल्ली के चिडिय़ाघर भेजा गया। 1973 में चमेली को लेकर मोहन के केयर टेकर पुलुआ बैरिया को भी दिल्ली बुला लिया गया। 2003 तक दिल्ली के चिडिय़ाघर में उन्होंने सेवाएं दी। 8 जुलाई 1976 को आखिरी बाघ के रूप में बचे विराट की भी मौत हो गई। इसके बाद 40 साल तक सफेद शेरों से रीवा वीरान रहा। 9 नवंबर 2015 को ह्वाइट टाइगर सफारी में विंध्या को लाया गया, वर्तमान में चार सफेद और तीन पीले बाघ हैं।

मोहन और उसके वंशज सफेद बाघों ने कई अवसरों पर रीवा सहित पूरे विंध्य का गौरव बढ़ाया है। दुनिया में जहां भी सफेद बाघ हैं, उनके वंशजों की चर्चा होगी तो इस क्षेत्र का नाम जरूर लिया जाएगा। वर्तमान में दुनिया की पहली ह्वाइट टाइगर सफारी जो अब तक इकलौती ही मुकुंदपुर में है। 25 हेक्टेयर क्षेत्रफल जंगल में सफेद बाघों को खुले में रखा गया है, ताकि वह जंगल के वातावरण का एहसास कर सकें,एवं 75 हेक्टेयर में चिड़ियाघर बनाया गया है जिसमे विभिन्न 640 प्रकार के जानवर रखे जाएंगे अभी सफ़ेद बाघ और पीले बाघ के अलावा 1 जोड़ा बब्बर शेर का और भालू,चीता, तेंदुआ,हिरण,काला हिरण,चिंकारा,कांकर, चीतल,नील गाय,जंगली सूअर,इत्यादि है तथा अभी और बाड़े का निर्माण हो रहा है जल्द ही और नए जानवर आने वाले है ।

1987 में डाक टिकट
मोहन के चलते कई बार क्षेत्र का नाम रोशन हुआ है। भारत सरकार के डाक और दूरसंचार विभाग ने 1987 में डाक टिकट जारी किया। यह कार्यक्रम रीवा में ही आयोजित किया गया और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री ने इसे जारी किया था। इसमें मोहन की फोटो लगाई गई। उनदिनों डाक टिकटें बड़ी संख्या में प्रसारित होती थी।

जानवरों का पहली बार बीमा
देश में जानवरों का पहली बार बीमा सफेद बाघ मोहन का ही हुआ था। एक समारोह में मोहन को दिल्ली ले जाया गया था, उस दौरान ढाई लाख रुपए का बीमा कराया गया था। सुरक्षा के लिए दो विशेषज्ञ भी भेजे गए थे।

अमेरिका की शान बनी मोहिनी
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति की इच्छा के बाद मोहिनी नाम की सफेद बाघिन को 5 दिसंबर 1960 को अमेरिका ले जाया गया। जहां पर ह्वाइट हाउस में भव्य स्वागत किया गया।

राजपथ पर झांकी
26 जनवरी 2016 को दिल्ली के राजपथ में गणतंत्र दिवस के अवसर पर सफेद बाघों की झांकी मध्यप्रदेश सरकार की ओर से प्रदर्शित की गई।

Monday, July 29, 2019

खंधो काली माता मंदिर गोविन्दगढ़

खंधो मंदिर गोविन्दगढ़ पहाड़ -
यह मंदिर गोविन्दगढ़ नगर के दक्षिणी पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर काली माँ को समर्पित है इसी मंदिर के समीप ग्यारह और मंदिर है जिनमे संतोषी माता ,दुर्गा माता,फूलमती माता ,मरी माता,विष्णु भगवान ,हनुमान जी,शंकर जी,पार्वती माता और गणेश जी की मंदिर स्थापित है, किंतु सोमवार को यहाँ अधिक श्रद्धालु एकत्र होते है। मकर संक्रांति को यहाँ मेला लगता है।





खंधो मंदिर के समीप पूर्व दिशा में एक कुंड है। कैमूर पहाड़ी पर स्थित एक झील का पानी इस कुंड में गिरता है और इस प्रकार एक प्रपात का निर्माण होता है। कुंड 20 फीट चौड़ा और 40 फीट लंबा है। यह स्थान पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है

Saturday, April 6, 2019

जगंन्नाथ मंदिर मुकुंदपुर

रीवा। विंध्य क्षेत्र में श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर मुकुन्दपुर में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी होली पर्व के अवसर पर आटिका महापर्व का आयोजन किया गया था।
मालूम हो कि श्री जगन्नाथ मंदिर में आटिका पर्व के दौरान आटिका प्रसाद चढ़ाने और कढ़ी-भात का प्रसाद ग्रहण करने के लिए रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली और पन्ना से हजारों श्रृद्धालु यहां उमड़ते हैं। मुकुन्दपुर में  जिसमें होलिका का दहन का नाट्य प्रस्तुति कलाकारों द्वारा दी जाती है और होलिका दहन किया जाता है एवं फगुआ को सुबह 11 बजे से आटिका प्रसाद का वितरण प्रारंभ किया जाता है। आयोजन समिति सदस्य हरीश त्रिपाठी ने कहा कि कहावत है कि जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ, होली के दिन विंध्य धरा मुकुंदपुर में चरितार्थ होती है। आटिका प्रसाद का अत्यंत महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ स्वामी के दर्शन और उनके महाप्रसाद के सेवन से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है उनके भात को लेकर सदियों से जाति पंथ का भेदभाव समाप्त हुआ। उनके प्रसाद के रूप में मानव में एकांकी भाव का प्रकटीकरण होता है और सामाजिक समरसता और भाई चारा को बढ़ावा मिलता है।
आटिका महाप्रसाद का खर्च दो लाख तक
बता दें के आटिका महाप्रसाद चढ़ाने का खर्चा करीब दो लाख रुपया आता है। महाप्रसाद आटिका चढ़ाने वाले व्यक्ति को मंदिर की साज सज्जा, मरम्मतीकरण और फगुआ के दिन जुटने वाली लाखों की भीड़ को कढ़ी-भात का भंडारा कराना होता है।
महाराजा भाव सिंह जू देव ने कराया था निर्माण
मुकुंदपुर जगन्नाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, रीवा राज्य के महाराजा भाव सिंह जू देव ने सन् 1680-85 के मध्य यहां मंदिर का निर्माण करवाया था और जगन्नाथपुरी जाकर वहां से भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा माता एवं बलभद्र की विशाल प्रतिमाएं लाकर स्थापित कराई थी ऐसी भव्य और दिव्य प्रतिमाएं कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बता दें कि महाराजा भाव सिंह जू देव का विवाह पुरी में हुआ था। रानी ने भगवान जगन्नाथ मंदिर की इच्छा जताई थी महाराजा पुरी गए थे और वहां से तीन मूर्तियां साथ लाए थे। एक मूर्ति मुकुंदपुर में, दूसरी बिछिया और तीसरी किला में प्राण प्रतिष्ठा की थी। महाराजा भाव सिंह जू देव ने पहली आटिका मुकुंदपुर में चढ़ाई थी।
भगवान विष्णु की कल्चुरी कालीन मूर्ति भी यहां
इन प्रतिमाओं के बीच में भगवान विष्णु की कल्चुरी कालीन भारतीय कला दर्शन की एक उत्कृष्ट मूर्ति भी स्थापित है। कहते है कि कल्चुरी काल में यहां भगवान विष्णु का मंदिर था कालांतर में मंदिर के गिर जाने पर महाराजा भाव सिंह ने ईरानी गुम्बद शैली का मंदिर निर्माण कराया और उसी मेंं इन मूर्तियों की स्थापना कराई।
2030 तक आटिका की बुकिंग
श्री जगन्नाथ मंदिर मुकुंदपुर की आस्था का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2030 तक आटिका प्रसाद की बुकिंग हो चुकी है। अगर कोई चाहे इससे पहले आटिका चढ़ाना तो होली के फगुआ के दिन तो संभव नहीं है। इसके लिए पूर्णिमा का विकल्प रखा गया है।

Thursday, January 17, 2019

रीवा एक परिचय



   

मध्य प्रदेश स्थित रीवा कभी ब्रिटिश काल के दौरान एक बड़ी रियासत हुआ करता था, और आज राज्य के सबसे प्रमुख शहरों में गिना जाता है। यह एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक विरासत जो अपने प्राचीन किले-भवनों के साथ प्राकृतिक खजानों(वन, नदी-झरने, हरा-भरा परिदृश्य) के लिए काफी प्रसिद्ध है। मध्य प्रदेश के बाकी पर्यटन गंतव्यों की तरह यह भी सैलानियों के मध्य काफी ज्यादा लोकप्रिय है।


अगर आप कुदरती खूबसूरती के साथ ऐतिहासिक विरासतों को देखने में दिलचस्पी रखते हैं, तो आपको यहां एकबार जरूर आना चाहिए। हमारे साथ जानिए पर्यटन के लिहाज से रीवा आपके लिए कितना खास है, जानिए यहां के चुनिंदा सबसे शानदार स्थानों के बारे में। 
रानी तालाब

रीवा भ्रमण की शुरूआत आप यहां के रानी तालाब से कर सकते हैं, दरअसल तालाब के रूप में प्रसिद्ध यह वास्तव में एक प्राचीन कुंआ है। रानी तालाब राज्य के सबसे पुराने कुओं में से एक है, इसलिए पर्यटक इसे देखना ज्यादा पसंद करते हैं। यह तालाब सिर्फ प्राचीन होने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक पवित्र जलाशय भी है क्योंकि यह राज्य के प्रसिद्ध काली मंदिर के निकट स्थित है।
माना जाता है कि यह मंदिर श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं को पूरा करता है, इसलिए यहां बड़ी संख्या मेंदर्शनाभिलाषियों का आगमन होता है। नवरात्रि और दिवाली के दौरान यहां भव्य पुजा और मेले का आयोजन किया जाता है।
गोविंदगढ़ महल

रीवा के ऐतिहासिक स्थलों में आप प्रसिद्ध गोविंदगढ़ महल देख सकते हैं। इस महल की भौगोलिक स्थित काफी खास है, क्योंकि आप यहां महल के साथ-साथ अन्य प्राकृतिक आकर्षणों(नदी, झरना, जंगल) को भी देख सकते हैं। अतीत से जुड़े साक्ष्य बताते हैं कि इस महल का निर्माण 1881 में तत्कालीन राजा द्वारा किया गया था। महल के अलावा आप यहां गोविंदगढ़ झील भी देख सकते हैं, जिसके तट पर यह पूरा महल खड़ा है।
यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम द्वीप भी बनाए गए हैं। माना जाता है कि भारत का सबसे पहला सफेद बाघ यहीं के जंगलों में पाया गया था। महल की वास्तुकला देखने लायक है। आप यहां इन-हाउस संग्रहालय भी देक सकते हैं।

रीवा का किला
गोविंदगढ़ महल के अलावा आप यहां प्रसिद्ध रीवा का किला देख सकते हैं। इस किले का नाम शहर के नाम पर रखा गया था। माना जाता है कि इस किले का निर्माण सलीम शाह ने करवाया था जिसने इसे अपूर्ण ही छोड़ दिया था, बाद में रीवा के महाराजा ने इस किले को पूरा बनाने का कार्य करवाया। रीवा फोर्ट राज्य में बेहतरीन किलों में गिना जाता है, और यह राज्य की सांस्कृतिक परंपराओं का एक गर्व प्रतीक भी है।
अपनी भव्यता और प्राचीन महत्व के कारण यह अब एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन चुका है। इतिहास और संस्कृति का एक अनोखा मिश्रण है यह किया जहां का भ्रमण एक आदर्श विकल्प रहेगा।
पुरवा जलप्रपात

ऐतिहासिक किलों के अलावा आप यहां के खूबसूरत जलप्रपातों की सैर का आनंद ले सकते हैं। राज्य में 70 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सबसे खूबसूरत झरनों में गिना जाता है पुरवा जलप्रपात। इस झरने का जल स्रोत टोंस नदी है। ऊंची चट्टानों के साथ गिरता पानी दूर से रोमांचक एहसास दिलाता है।
पुरवा जलप्रपात का महत्व सिर्फ वर्तमान तक ही सीमितन नहीं है बल्कि इसका उल्लेख हिन्दू महाकाव्य रामायण में भी मिलता है। इसके अलावा यह एक फैमली पिकनिक स्पार्ट भी है।
क्योंटी जलप्रपात

उपरोक्त स्थानों के अलावा आप यहां के प्रसिद्ध क्योंटी जलप्रपात की सैर का भी प्लान बना सकते हैं। क्योंटी फॉल को भारत के सबसे ऊंचे झरनों(नंबर 24 ) की सूची में शामिल किया गया है। इस जलप्रपात का जल स्रोत्र तम्सा की सहायक महाना नदी जो इस झरने की मदद से 98 मीटर की ऊंचाई से गिरती है। इस जल का इस्तेमाल पेयजल और सिंचाई के लिए भी किया जाता है। माना जाता है कि यह झरना भगवान राम-सीता से भी जुड़ा है, इसलिए यहां कई लोग पूजा अनुष्ठान भी करते हैं।

Thursday, January 3, 2019

घिनौची धाम पियावन रीवा

घिनौची धाम पियावन: जहां झरना करता है शिव का जलाभिषेक


 रीवा। घिनौची धाम, जिसे पियावन के नाम से जाना जाता है। यह अतुलनीय ऐतिहासिक, प्राकृतिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल मध्य प्रदेश के रीवा जिले से 42 किलोमीटर दूर सिरमौर की बरदहा घाटी में है। प्रकृति की अनुपम छटा के बीच यह धाम धरती से 200 फीट नीचे और लगभग 800 फीट चौड़ी प्रकृति की सुरम्य वादियों से घिरा हुआ है। यहां प्राकृतिक झरने का श्वेत जल भगवान भोलेनाथ का 12 महीने निरंतर जलाभिषेक करता है। जिसे देखना रोमांचकारी है।
यहां की खास बात जो इसे विशेष बनाती है वो है धरती से 200 फीट नीचे दो अद्भुत जल प्रपातों का संगम। जिसका आनंद जुलाई से सितंबर माह के मध्य लिया जा सकता है। साथ ही अति प्राचीन शिवलिंग और यहां पहाडिय़ों में उकेरे प्राचीन शैल चित्र भी हैं।  चट्टानों में उकेरे गए प्रागैतिहासिक शैल चित्र, जो इस क्षेत्र की गौरव गाथा भी बताते हैं। दो अद्भुत सर्पिलाकार चट्टानें अपने आप में अद्भुत हैं। इसके आलावा मां पार्वती की साक्षात दिव्य प्रतिमा भी मौजूद है।

ब्रिटिश काल में हुई थी खोज

पावन घिनौची धाम की खोज का श्रेय जाता है सर गैरिक को। जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर जनरल अलेक्जेंडर कोनिन्घ्म के सहायक थे।  कहानी थोड़ा रोचक है। सन 1883-84 में अलेक्जेंडर कोनिन्घ्म रीवा आए तो उन्होंने पावन घिनौची धाम का भी सर्वेक्षण किया। उन्होंने अपनी किताब रिपोर्ट ऑफ ए टूर इन बुंदेलखंड एण्ड रीवा इन 1883-84 एण्ड ए टूर इन रीवा, बुंदेलखंड, मालवा, ग्वालियर इन 1884-85Ó में पावन घिनौची धाम का उल्लेख दो पेजों में किया है। साथ ही उन्होंने ही पावन घिनौची धाम का नामकरण पियावनÓ किया था। वो लिखते हैं कि पियावन जो एक पवित्र स्थल है। छोटी सी घाटी में है। कैठुला से 6 मील की दूरी पर दक्षिण-पूर्व की तरफ  एवं रीवा से 25 मील उत्तर-पूर्व की तरफ  स्थित है
पियावन का बघेली भाषा में शाब्दिक अर्थ होता है, पानी पीने का स्थान।  करीब एक मील की लम्बाई,  800 फीट की चौड़ाई एवं 200 फीट की उंचाई एवं दोनों तरफ  प्राचीन चट्टानों से घिरा हुआ है।

अध्र्य का व्यास 14 इंच, लिखे थे अभिलेख
अलेक्जेंडर कोनिन्घ्म आगे लिखते हैं कि अध्र्य के ऊपर 6 लाइनों में कुछ अभिलेख लिखे हुए थे। जो कि मौसम के कारण बुरी तरह से खुदे हुए अक्षर के रूप में प्रतीत हो रहे थे। गैरिक ने इस अभिलेख का एक बड़ा फोटोग्राफ  बनाया। यह अभिलेख बहुत कीमती एवं अतुलनीय था क्योंकि यह कल्चुरी राजकुमार गांगेय देव का एक मात्र अभिलेख था।जो महमूद गजनवी के समकालीन थे। यह अभिलेख इसलिए भी महत्वपूर्ण रूप से बहुत कीमती था क्योंकि यह चेदि वंश के कल्चुरी राजाओं का अधिराज्य भी प्रदर्शित करता था। जिनका राज्य विन्ध्य पर्वत श्रंखलाओं के उत्तर तक इलाहाबाद से सिर्फ 50 मील की दूरी तक था।

अंग्रेजो के जाने के बाद  फिर  सर्वेश सोनी जी के जूनून और अथक प्रयासों के बाद आज घिनौची धाम पियाबन में पर्यटन के लिए अपना नयी पहचान बना रहा है जो रीवा का प्रथम विकसित मनोरंजन क्षेत्र बन गया है।

ऐसे पहुंचा जा सकता है यहां
रीवा रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद पुराने बस स्टैंड से जवा जाने के लिए बस मिलती है। जो सिरमौर होते हुए बरदहा घाटी पहुंचाती है। यहां से करीब एक किमी. पैदल चलने के बाद घिनौचीधाम पहुंचा जा सकता है। यह स्थान पहाड़ों पर आच्छादित हरियाली के बीच पर्यटन का रोमांच पैदा करता है।

मलेशिया और गोवा से कम नहीं है विंध्य के पर्यटन स्थल


  अगर आप नए साल की छुट्टियों पर जाने का मन बना रहे हैं तो अब आपको कहीं जानें की जरूरत नहीं है। क्योकि विंध्य के पर्यटन क्षेत्र किसी गोवा और मलेशिया के पर्यटन क्षेत्र से कम नहीं। बस आपको अपने विंध्य पर्यटन क्षेत्र के बारे में पूरी जानकारी हो।  विंध्य के पर्यटन क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी दे रहा आप इस साल न्यू ईयर को एंजॉय कर सकते हैं।

मैहर धाम में मां शारदा मंदिरrewa news
सतना से 45 किलोमीटर की दूरी पर त्रिकूट पर्वत में विराजमान हैं मां शारदा देवी। जहां मां शारदा समूचे देश में अतुलनीय हैं, यहां हजारों भक्त रोजाना दर्शन के लिए आते हैं । कहा जाता है की मां शारदा के अनन्य भक्त आलहा भी यहां सर्वप्रथम रोजाना आज भी पूजा करने आते हैं। आलहा उदल अखाड़ा एवं जल प्रपात भी यहां के दर्शनीय स्थल है।

धामों का धाम चित्रकूट धाम
सतना से 85 किलोमीटर की दूरी पर है चित्रकूट धाम। यह धाम देश के प्रसिद्ध पर्यटन नगरों में से एक है। मां मंदाकिनी नदी पर स्थित रामघाट है, यहां के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सती अनुसूईया आश्रम, कामतानाथ मंदिर, भरत कूप, हनुमान धारा, गुप्त गोदावरी स्फटिक शिला, जानकीकुंड प्रमुख हैं।

माधवगढ फोर्ट
सतना के माधव गढ़ में स्थित ऐतिहासिक फोर्ट जिसकी सुन्दरता टमस नदी के किनारे देखते ही मिलती है यहां का ऐतिहासिक प्राकृतिक सौन्दर्य अपने आप में ही अद्भुत हो जो की पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है 

व्हाइट टाइगर सफारी
व्हाइट टाइगर सफारी के रूप में विकसित मुकुंदपुर वन्य प्राणी चिडिय़ाघर सफेद शेरों की धरती के रूप में अनूठी पहचान रखनी वाली विंध्य वसुंधरा में अब सफेद शेरों का आगमन शुरू हो चुका है। अब यहां का आनंद भी पर्यटक उठा सकेंगे। सफेद शेरों के अतिरिक्त यहां 63 प्रकार के अन्य जानवर भी देश के कोने कोने से आएंगे।

ईको टूरिज्म पार्क
रीवा की जीवनदायिनी बीहर एवं बिछिया नदी के टापू में बन कर तैयार हो रहा है विश्व स्तरीय ईकोटूरिज्म पार्क इस पार्क में पर्यटकों को विश्व स्तरीय मनोरंजन, पर्यटन सुविधायें मुहैया करायी जायेंगी । वाटर स्पोट्र्स, एडवेंचर स्पोर्ट, रेस्टोरेंट, मनोरंजन पार्क जैसी सुविधायें मिल सकेंगी तो बीहर नदी के ऊपर बन कर तैयार हो चुका है एयर सस्पेंशन ब्रिज, जिसके ऊपर से गुजरते हुए यहां आने वाले पर्यटक दो नदियों के विहंगम प्राकर्तिक सौंदर्य का आनंद ले सकेंगे।

रीवा फोर्ट, म्यूजियमrewa news
रीवा राजघराने का ऐतिहासिक फोर्ट देशी विदेशी पर्यटकों की सबसे प्रथम पसंद है, का गौरवमयी इतिहास है तो प्रसिद्ध बाघेला म्यूजियम भी हैं।  रीवा राजघराने में विदेशी देशों के झूमर भी यहां की सुन्दरता में चार चांद के सामान हैं। साथ ही रीवा से 35 किलोमीटर की दूरी पर महाना नदी एवं फॉल के तट पर स्थित है 13 वीं शताब्दी का ऐतिहासिक क्योटी फोर्ट, रीवा से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है त्योंथर फो र्ट एवं नईगढ़ी फोर्ट।

जलप्रपातों व घाटियों की मनमोहक श्रंखलाrewa news
रीवा जलप्रपातों की नगरी है, जलप्रपातों से ही यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य विश्व प्रसिद्ध है रीवा में ही मध्यप्रदेश का सबसे ऊंचा चचाई जलप्रपात है तो क्योटी, पुरवा, बहुती घिनौची धाम का सौंदर्य अपने आप में ही अद्भुत है। रीवा से चचाई की दूरी 50 किलोमीटर, क्योटी की 35 किलोमीटर, पुरवा की दूरी 35 किलोमीटर, बहुती की दूरी 70 किलोमीटर, घिनौची धाम की दूरी 40 किलोमीटर है। रीवा की घाटियों की सुन्दरता अपने आप में ही अनूठी है जिनमे बरदाहा घाटीए सोहागी घाटीए छुहिया घाटी का विहंगम प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है।

बसामन मामा
प्रदेश के प्रथम गौ अभयारण्य के रूप में प्रस्तावित है रीवा की आस्था का प्रमुख केंद्र बसामन मामा।  यहां आने से भक्तों, पर्यटकों को असीम आनंद, शांति की अनुभूति होती है तो भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। बसामन मामा धाम रीवा से 35 किलोमीटर की दूरी है 

देउर कोठार के प्राचीन बौद्ध स्तूप
विश्व शान्ति एवं सद्भाव का सन्देश देता है बौद्ध धर्म, रीवा से 60 किलोमीटर की दूरी पर देउर कोठार में पांच हजार वर्ष प्राचीन बौद्ध स्तूपों की सबसे बड़ी श्रंखला है। यहां शैल चित्रों एवं गुफाओं की भी श्रंखला है।

ऐताहासिक गुफाए हैं खास
रीवा से 120 किलोमीटर की दूरी पर सीधी के प्रसिद्ध पर्यटन केन्द्रों में माढा की ऐतिहासिक गुफाएं, संजय गांधी नेशनल पार्क, चंद्रेह के प्राचीन मंदिर, भंवरसेन प्रमुख हैं।

बांधवगढ़ नेशनल पार्क
उमरिया क्षेत्र में स्थित बांधवगढ़ के शेरों की दहाड़ विश्व में प्रसिद्ध हैं दुनिया भर के प्राकृतिक पर्यटन प्रेमी व वन्य प्राणी प्रेमी यहां आते हैं। बाघों एवं शेरों के मध्य सफारी का आनंद व प्राकृतिक का विहंगम सौंदर्य पर्यटकों को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है।

विन्ध्य वसुंधरा में है विश्व पर्यटक केंद्र अमरकंटक
रीवा से 300 किलोमीटर की दूरी पर है अमरकंटक और अमरकंटक में है मां नर्मदा नदी का उद्गम स्थल, महानद सोन उद्गम स्थल, प्राचीन स्मारक मंदिरों के समूह,  कपिल धारा व दूधधारा जलप्रपात, जैन मंदिर, माई की बगिया धूमने लायक है।

विंध्य में कई ऐसे पर्यटन क्षेत्र है जो एतिहासिक और प्राकृतिक है। यहां पर विन्ध्य के लोगों को जरूर समय बिताना चाहिए।
पंकज द्विवेदी संचालक व्लॉग ,vindhya pradesh the land of white tiger 

रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम

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