Wednesday, May 13, 2020

विंध्यप्रदेश की पुनःस्थापना के प्रयास में विंध्यवासी - बघेली डिजिटल प्रमोटर और सपोर्टर श्रीवेन्द त्रिपाठी जी द्वारा विशेष जानकारी

जय विंध्य प्रदेश, जय बघेली॥
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विंध्य प्रदेश की पुनर्स्थापना के प्रयास में विंध्यवासी-  बघेली डिजिटल प्रमोटर और सपोर्टर श्रीवेन्द त्रिपाठी द्वारा विशेष जानकारी :

वर्तमान समय में विंध्य प्रदेश में कई ऐसे संगठन बन चुकें है. जिनका सपना विंध्य प्रदेश को पुनः स्थापित करने के साथ ही बघेली बोली को बघेली भाषा का दर्जा दिलाना है. इसके साथ ही विंध्य प्रदेश के बेरोजगारी की समस्या पर विषेश ध्यान देने के साथ ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाने की भी रणनीति तैयार कर चुके हैं, ये संगठन रीवा सीधी से लेकर भोपाल, दिल्ली तक फैले हुए है. विंध्य प्रदेश की स्थापना के लिए इन्होंने उसका नक्सा (मैप) , जनसंख्या और क्षेत्रफल के साथ साथ उसके आय के साधन, खनिज संपदा इत्यादि पर भी पूरी शोध करने के बाद विंध्य प्रदेश की स्थापना की मांग कर रहे हैं जो कि सर्वथा उचित है.
विंध्य प्रदेश के विलीनीकरण के समय शहादत देने वाले वीरों को विंध्यवासी भूले नहीं है. और उनकी शहादत किसी भी कीमत पर बेकार नहीं जाने देगे. साथ ही इस मिसन में विंध्य प्रदेश के साहित्यकार, रंगकर्मी और मीडिया भी अपनी विशेष भूमिका अदा कर रहीं हैं कहने का तात्पर्य यह है कि कलमकार और कलाकार दोनों कंधा से कंधा मिलाकर प्रयासरत है
. विंध्य प्रदेश में सभी तरह के खनिज संपदा के मौजूद होने के बाद भी ये अपने अस्तित्व में नहीं है यह एक बहुत ही चिंता का विषय है. आज भी यहाँ पर बेरोजगारी अपने चरम सीमा पर है. लोग रोजी रोटी कमाने के लिए महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर है. जिसके कारण हमारी कला, संस्कृति, रीति रिवाज, परंपराये भी विलीन हो रही है. हमारे विंध्य प्रदेश में अपार प्राकृतिक संपदा भी है यहाँ तक कि ऐसी ऐसी संपदा है जो पूरे भारत में कहीं नहीं है समृद्धि का प्रतीक हीरा की खदानें भी विंध्य की धरातल पर विद्यमान है, कोयला के विसाल भंडार के साथ साथ पर्वत, नदी, और उपजाऊ भूमि की भी भरमार है, मौसम और जलवायु भी अब्बल दर्जे का है फिर भी विंध्य प्रदेश अपने अस्तित्व में क्यों नहीं है? यह एक विचारणीय  पहलू है. आखिर कब तक विंध्य प्रदेश के निवासी ये सब कुछ जानते हुए भी रोजी रोटी के लिए दर दर भटकता रहेगा...!
अब विंध्यवासी हर प्रयास के लिए तैयार है लेकिन विंध्य प्रदेश को अपने अस्तित्व में लायेंगे जरूर
जय विंध्य प्रदेश, जय बघेली॥

Friday, March 6, 2020

भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद आटिका महापर्व मुकुन्दपुर , विंध्यप्रदेश


मुकुंदपुर का आटिका महापर्व

रीवा राज्य के 25 वे महाराजा भाव सिंह जूदेव ने सन 1684-85 में पुरी (उड़ीसा) से भगवान जगन्नाथ जी ,बलभद्र एवं सुभद्रा माता की विशाल प्रतिमाएं स्थापित कराकर आटिका महाप्रसाद की परंपरा की सुरुआत की थी । कहा जाता है कि रीवा महाराजा स्वयं उपस्थित होकर यहाँ का महोत्सव संपन्न कराते थे किंतु बाद में आटिका महाप्रसाद की परंपरा बीच में बंद हो गयी थी । वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद मुकुंदपुर के स्थानीय निवासी  पंडित ब्रजवासी राम शुक्ल , बिहारीलाल गुप्त एवं मुखिया श्यामसुंदर त्रिपाठी ने एक आटिका कमेटी का गठन आसपास के ग्रामो का जनसहयोग लेकर पुनः विधिवत आटिका महाप्रसाद महोत्सव मनाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कराया तब से यह उत्सव निरंतर उत्तरोत्तर विकासोंन्मुख है ।
फाल्गुन की पूर्णमासी एवं चैत्र मास की प्रतिपदा को दो दिवसीय इस महोत्सव में यहाँ मेला लगता है । भक्त प्रहलाद के नाटक के साथ विविध मनोरंजक कार्यक्रम होते है तथा दोपहर 12 बजे भगवान को भोग लगाने के बाद आटिका महाप्रसाद का वितरण प्रारम्भ होता है जो रात्रि 12 बजे तक चलता है ।

अब आटिका महाप्रसाद चढाने का जिम्मा व्यक्तिशः हो गया है। धनी -मानी लोग प्रबंधन समिति में आवेदन लगाकर इसका पूरा खर्च उठा लेते है ।
इस वर्ष 10 मार्च 2020 को आटिका महाप्रसाद महापर्व मनाया जायेगा जिसमे आटिका महाप्रसाद चढाने का सौभग्य मुकुंदपुर के श्री दया गुप्ता पिता स्व. यज्ञनारायण गुप्ता को प्राप्त हुआ है । इसके पूर्व प्रबंधन समिति के सहयोग से दिनाँक 2 मार्च 2020 से साप्ताहिक भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ भी आयोजित किया गया है ।


व्यक्तिशः आटिका महाप्रसाद चढ़ाने वालो की सूची -

1. श्री शिवदीन गुप्ता सतना वर्ष 1952
2. श्री हीरालाल चिकवा मुकुंदपुर वर्ष-1982
3. श्री रामनिवास गुप्ता रामनगर वर्ष- 1989,90,93,95
4. श्रीमती लल्ली देवी पति सौखिलाल  गुढ़  वर्ष-1996
5. श्री गंगा प्रसाद गुप्ता रामपुर नैकिन  वर्ष- 1997
6. साधूलाल गुप्ता रायपुर कर्चुलियान वर्ष-1998
7.बघेल परिवार जमुना,कस्तरा, सुकुलगंवा  वर्ष -1999
8. विजयकुमार गुप्त हिनौती (सतना) वर्ष-2000,2001,2002
9.गंगा सिंह बुढगौना (सीधी)वर्ष- 2003
10. बद्री प्रसाद त्रिपाठी मुकुंदपुर  वर्ष- 2004
11. मंदिर प्रबंधन समिति मुकुंदपुर , वर्ष- 2005
12. रामाधार गुप्ता न्यू रामनगर , वर्ष-2006
13. जगदीश प्रसाद गुप्ता कोठीवाल सीधी , वर्ष-2007
14. महादेव प्रसाद तिवारी मुकुंदपुर , वर्ष-2008
15. डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह (पूर्वमंत्री) अमरपाटन, वर्ष-2009
16.बघेलपरिवर जमुना, कस्तरा,शुक्लगवाँ वर्ष 2010
17.बड़ा अखाडा मैहर +प्रतीक त्रिपाठी मुकुंदपुर , वर्ष -2011
18.सुरेंद्र ताम्रकार (पान वाले ) फोर्ट रोड रीवा, वर्ष-2012
19.मुन्नालाल गुप्ता रिमड़ा अमरपाटन, वर्ष-2013
20.हनुमान समिति कृष्णम भइया भीषमपुर, वर्ष-2014
21.श्रीमती रामसखी पत्नी रामहित्त गुप्त सतना,वर्ष-2015
22.जयपाल सिंह तिवारी मढ़ी मुकुंदपुर, वर्ष 2016
23. धर्मेंद्र सिंह तिवारी मढ़ी (मुकुंदपुर) वर्ष-2017
24. हरीश त्रिपाठी नकटी(वर्तमान- नायनपुर) , वर्ष-2018
25.मोहन लाल ताम्रकार , वर्ष-2019
26.दया गुप्ता  मुकुंदपुर , वर्ष-2020

2030 तक आटिका की बुकिंग-

श्री जगन्नाथ मंदिर मुकुंदपुर की आस्था का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2030 तक आटिका प्रसाद की बुकिंग हो चुकी है । अगर कोई चाहे इससे पहले आटिका चढ़ता तो होली के फगुआ के दिन तो संभव नहीं है। इसके लिए पूर्णिमा का विकल्प रखा गया है ।
जगन्नाथ भगवान के आटिका का महाप्रसाद लेने   बड़ी दूर-दूर से लोग आते  है रीवा,सतना, सीधी,सिंगरौली ,शहडोल,गोविन्दगढ़,मैहर, इतियादि जगह से आते है


✍✍✍✍----- पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग- Vindhya pradesh the land of white tiger

Wednesday, March 4, 2020

यहाँ विस्तार से जानिए, बाघो की पहली पसंद क्यों रहे विंध्य के जंगल

Vindhya pradesh the land of White Tiger


World wildlife Day ;  यहाँ विस्तार से जानिए, बाघों की पहली पसंद क्यों रहे, विंध्य के जंगल

विंध्य में वनों की विविधता से जंगल बने रहे बाघों का बसेरा
- दूसरे हिस्सों से आकर अब भी विंध्य के जंगलों में भ्रमण कर रहे हैं बाघ

world wildlife Day, Vindhya forests are the first choice of tigers
रीवा. विंध्य के जंगलों से बाघों का गहरा नाता रहा है। लंबे समय से यहां पर इनका बसेरा रहा है। इन जंगलों में वह सभी संसाधन मौजूद रहे हैं जो बाघों एवं अन्य जानवरों को आकर्षित करते रहे हैं। यहां का भौगोलिक परिदृश्य ऐसा रहा है कि बाघों को उनकी इ'छा के अनुरूप ठहरने और टहलने में कोई रुकावट नहीं होती थी। अब से करीब पांच दशक पहले तक बाघों को मारने में कोई प्रतिबंध नहीं था, इस वजह से बड़ी संख्या में इनका शिकार भी होता था, इसके बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां पर आते रहे हैं। इस क्षेत्र के जंगलों की संरचना ऐसी रही है कि ऊंचे पहाड़ों में घने वन रहे और उनके नीचे नदियों की श्रृंखला रही है। कुछ जगह तो जलप्रपात भी हैं, जिसकी वजह से पानी की जरूरत भी पूरी हो जाती थी। देश में घटती बाघों की संख्या के चलते साठ के दशक से ही जंगल एवं बाघों की सुरक्षा की चर्चा शुरू हो गई थी। इसे कानूनी रूप देने में करीब दस वर्ष का समय लगा और बाघों को विशेष दर्जा देते हुए इनके संरक्षण की शुरुआत की गई। लगातार घटती संख्या का असर विंध्य में भी पड़ा, यहां के जंगलों से बाघ गायब हो गए। लगातार प्रयास होते रहे, जिसकी वजह से अब नेशनल पार्क, ह्वाइट टाइगर सफारी और चिडिय़ाघर स्थापित कर फिर से बाघों की वापसी की गई है। साथ ही अन्य जानवरों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू हुए हैं।


- दूसरे जंगल छोड़कर यहां भागकर आ रहे बाघ
पहले देश भर में विंध्य बाघों को लेकर चर्चा रहा है। इनदिनों एक बार फिर यह क्षेत्र बाघों की पसंद का क्षेत्र बनता जा रहा है। पन्ना के नेशनल पार्क से जो बाघ निकलते हैं वह इसी ओर आते हैं। पन्ना से निकलकर सतना के सरभंगा से लेकर रीवा के सेमरिया के जंगल तक बाघ पहुंच रहे हैं। इनदिनों इसी क्षेत्र में ही छह से आठ के बीच में बाघों ने अपना डेरा जमा रखा है। इसी तरह बांधवगढ़ के नेशनल पार्क से निकलने वाले बाघ सीधी के मझौली, सतना के रामनगर, रीवा के गोविंदगढ़ के जंगल तक पहुंच रहे हैं। बीते साल ही करीब आधा दर्जन ऐसी घटनाएं हुई जिसमें गांवों तक बाघ पहुंचे हैं। रीवा जिले के डढ़वा गांव में करीब आठ घंटे तक बाघ की मौजूदगी से पूरे जिले में हड़कंप मच गया था। कई टीमों ने इसे रेस्क्यू कर सीधी के नेशनल पार्क में छोड़ा। इससे यह साबित होता है कि अब भी यहां के जंगल बाघों के अनुकूल हैं, जिसकी वजह से दूसरे क्षेत्रों से आकर यहां पर बाघ ठहरने का प्रयास कर रहे हैं।
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बाघों को मारने पर लगाया प्रतिबंध
वाइल्ड लाइफ संरक्षण को लेकर रीवा लंबे समय से प्रमुख केन्द्र के रूप में जाना जाता रहा है। 1951 में एक ऐसा घटनाक्रम हुआ कि उसके बाद से इस क्षेत्र में बाघों का संरक्षण शुरू हो गया। महाराजा मार्तण्ड सिंह को सीधी के कुसमी के जंगल में शिकार के दौरान बाघ का शावक मिला जो सफेद रंग का था। उसे पकड़वाकर गोविंदगढ़ लाया गया और किले में रखा गया। उस दौर में बाघों का जो जितना अधिक शिकार करता था, उसी के अनुरूप उसका वैभव भी माना जाता था। रीवा, सतना एवं सीधी के जंगलों में शिकार करने के लिए दूसरे राÓयों के राजा-महाराजा भी बुलाए जाते थे। साथ ही अन्य शिकारी भी चोरी-छिपे मारते रहे हैं। कुछ वर्षों के बाद मार्तण्ड सिंह ने बाघों का शिकार नहीं करने की घोषणां की और विंध्य के आम लोगों से भी इसकी अपील की। विंध्य प्रदेश के समय इन्हें विशेष शक्तियां भी मिली हुई थी, इस वजह से बाघों का शिकार धीरे-धीरे बंद होने लगा। बाद में केन्द्र सरकार ने वन एवं वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम बनाया, जिसमें बाघों के साथ ही जंगल के सभी जानवरों को मारने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
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- इंसान से अधिक सम्मान बाघ को मिला
वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर अब दुनियाभर में प्रयास शुरू किए जा रहे हैं। इसकी शुरुआत अब से 70 वर्ष पहले ही रीवा में हो गई थी। यहां गोविंदगढ़ किले में रखे गए पहले जीवित सफेद बाघ मोहन को लोगों की ओर से ऐसा सम्मान दिया गया, जो इंसान से भी अधिक था। महाराजा मार्तण्ड सिंह ने सफेद बाघ मोहन को आप कहकर संबोधित करते थे। इसका असर किले के व्यक्ति पर हुआ और यहां पर आने वाला हर कोई मोहन को उसी तरह का सम्मान देता था। कहा जाता है कि उस समय मोहन के सम्मान में उसके बाड़े के पास कोई तेज आवाज से नहीं बोलता था। इसी से वन्यजीवों के प्रति लगाव भी क्षेत्र के लोगों का बढ़ा। मोहन की जब मौत हुई थी तो उसका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इतना ही नहीं कई दिनों तक रीवा के साथ ही आसपास के जिलों में भी शोक सभाएं आयोजित की गई। कुछ समय पहले दिल्ली के एक प्रोफेसर ने शोध में यह बताया था कि देश में वन्य जीवों में जितना सम्मान मोहन को मिला, दूसरे जानवरों को नहीं मिला है।
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सफेद बाघों को खुले जंगल में छोडऩे का प्रयोग
सफेद बाघों को लेकर देश के साथ ही दुनिया के कई हिस्सों में शोध हुए हैं। दावा है कि वर्तमान में जहां पर भी सफेद बाघ मौजूद हैं, वह रीवा से भेजे गए पहले सफेद बाघ मोहन के वंशज हैं। लंबे अंतराल के बाद विंध्य के मुकुंदपुर जंगल में एक प्रयोग किया गया और दुनिया की पहली ह्वाइट टाइगर सफारी बनाई गई। यहां पर पहले एक सफेद बाघिन को छोड़ा गया, इसके बाद एक बाघ भी छोड़ा गया। इनदिनों सफेद बाघ का जोड़ा सफारी के खुले जंगल में विचरण कर रहा है। अब तक जहां पर भी सफेद बाघ रहे हैं, उन्हें चिडिय़ाघरों में ही रखा जाता रहा है। लेकिन इनके वंश को बढ़ाने की लगातार उठ रही मांगों के बीच खुले जंगल में छोडऩे की योजना भी सरकार की ओर से बनाई जा रही है। मिली जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश की सरकार ने वर्ष 2012 में ही एक प्रस्ताव नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी को प्रस्ताव भेजा था। उस दौरान भारतीय वन्यजीव संस्थान ने अनुमति नहीं दी थी। कुछ समय पहले ही संस्थान की ओर से नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी को कहा गया है कि सफेद बाघों को जंगल में बसाया जा सकता है। अब तक यह कहा जाता रहा है कि चिडिय़ाघरों में रहने की वजह से इन बाघों को खुले जंगल में नहीं रखा जा सकता, इनके लिए खुला जंगल उपयुक्त नहीं होगा। लेकिन मुकुंदपुर के ह्वाइट टाइगर सफारी में लगातार करीब चार वर्षों से रह रहे बाघों की रिपोर्ट के साथ ही अन्य कई स्थानों पर अध्ययन के बाद माना गया है कि खुले जंगल में सफेद बाघों को रखा जा सकता है। प्रदेश सरकार ने भी विंध्य क्षेत्र में ही यह प्रयोग करने की तैयारी की है। जिसमें सीधी जिले के संजयगांधी नेशनल पार्क को चिन्हित किया जा रहा है। यहां पर अब रायल बंगाल टाइगरों के बीच ही सफेद बाघ को भी जंगल में छोड़ा जाएगा। इसमें सीधे चिडिय़ाघर के बाघ नहीं छोड़े जाएंगे बल्कि सफारी में कुछ दिन पहले के बाद ही जंगल में छोड़ा जाना है।
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वन्यप्राणियों के प्रति लगाव बढ़ाने का माध्यम बना चिडिय़ाघर
विंध्य क्षेत्र के जंगलों में बाघों के साथ ही हिरणों की प्रजाति के बड़ी संख्या में जानवरों का ठिकाना रहा है। यहां लोगों में जानवरों के प्रति जानने की जिज्ञासा भी रही है। पहले बांधवगढ़ और पन्ना में नेशनल पार्क बनाया गया, इसके बाद सीधी जिले में सबसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र का संजयगांधी नेशनल पार्क स्थापित किया गया। बाद में छत्तीसगढ़ राÓय के गठन के चलते बड़ा हिस्सा सरगुजा और कोरिया जिलों में चला गया। सीधी जिले में ही काले मृगों का संरक्षण करने के लिए बगदरा अभयारण्य भी बनाया गया है। इतना ही नहीं कि विंध्य केवल बाघों और हिरणों तक सीमित रहा हो, सोन नदी में मगरों के लिए भी क्षेत्र आरक्षित किया गया है। कुछ समय पहले ही विंध्य क्षेत्र के मुकुंदपुर में चिडिय़ाघर और ह्वाइट टाइगर सफारी की शुरुआत हुई है। इसकी वजह से वन्यजीवों के प्रति क्षेत्र के लोगों को जानकारी भी हो रही है। दूर-दूर से लोग चिडिय़ाघर के जानवरों को देखने के लिए आते हैं। बाड़ों के बाहर से ही जानवरों की तस्वीरें लेकर लोग इनके बारे में अपनी प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर व्यक्त कर रहे हैं। वन्यजीवों के प्रति जानकारी लोगों तक पहुंचाने में यह कारगर साबित हो रहा है। वर्तमान में महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं टाइगर सफारी मुकुंदपुर में जानवरों की संख्या -
 सफेद बाघ चार, सिंह तीन, रायल बंगाल टाइगर 6, तेंदुआ चार, भालू तीन, करीब आधा सैकड़ा की संख्या में चीतल, बाइल्डबोर तीन, ब्लैक बक पंद्रह, सांभर आठ, नील गाय तीन, चौसिंघा एक,थामिन डिअर 8 सहित अन्य जानवर हैं।
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वन्यजीव विशेषज्ञ की नजर में.............

वन्यजीव ही शान हैं, इनके बिना अस्तित्वहीन हो जाएंगे जंगल
मनुष्य का अस्तित्व वन्यजीवों के अस्तित्व से जुड़ा है, जंगलों में रह रहे सभी वन्यजीवों का इकालाजिकल बैलेेंस स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी जंगल से बाघों या अन्य मांसाहारी जीवों को अलग कर दिया जाए तो कालांतर में वह जंगल अपने आप नष्ट हो जाएगा। मांसाहारी जंतुओं के न रहने से शाकाहारी जंतुओं की संख्या में वृद्धि होने के कारण शाकाहारी पौधे धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। ठीक इसी तरह यदि किसी जंगल से सभी पक्षियों को हटा दिया जाए तो भी जंगल अपने आप समय के साथ नष्ट हो जाएंगे। क्योंकि जंगलों में पौधों में फूलों के परागण करने एवं बीज निर्माण तथा फलों को खाकर बीजों के वितरण में पक्षी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस कारण पौधों की जैव विविधता बनी रहती है। पौधों एवं वन्य जीवों की जैव विविधता परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर रहती है। जंगलों में पाए जाने वाले बहुत से कीटों की गांव के खेतों में उगने वाले पौधों के परागण एवं बीज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इस प्रकार देश के जंगल अपने वन्यजीवों द्वारा समाज को सेवाएं दे रहे हैं। इन कीटों के न रहने से संबंधित फसलों की पैदावार अपने आप खत्म हो जाएगी। मधुमक्खियों द्वारा शहद निर्माण कर समाज को प्रदान करना एक-दूसरा इको सिस्टम सर्विसेस का उदाहरण है। विंध्य क्षेत्र के जंगलों में से रीवा-सतना के चित्रकूट, मझगवां, ककरेड़ी, गोविंदगढ़ एवं अंतरैला क्षेत्र के जंगलों का अपना अलग महत्व है। देश के मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंगल या तो साल प्रभावी जंगल होते हैं या सागौन प्रभावी, लेकिन विंध्य के उपरोक्त क्षेत्रों में पाए जाने वाले जंगल न तो साल प्रभावी हैं और न ही सागौन प्रभावी। विध्ंय क्षेत्र की खूबसूरत भौगोलिक संरचना के कारण ही यहां पर बांधवगढ़, पन्ना एवं संजयगांधी नेशनल पार्क के साथ कई अभयारण्य तथा अमरकंटक का अचानकमार बायोस्फियर रिजर्व स्थापित है। देश का शायद ही ऐसा कोई भूखंड होगा, जहां इस प्रकार वन्यजीवों से धनी वास स्थान होगा। विंध्य के तीनों नेशनल पार्क, अभयारण्य एवं बायोस्फियर रिजर्व आपस में कारीडोर से जुड़े होने के कारण वन्यजीवों की प्रचुरता को बढ़ाते हैं। अत: इन कारीडोर्स को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी विंध्य के सभी लोगों की होती है। कभी-कभी पन्ना नेशनल पार्क के बाघों का चित्रकूट, ककरेड़ी एवं बरदहा घाटी के जंगलों में विचरण करना इस बात की पुष्टि करता है कि यह क्षेत्र एक प्रमुख कारीडोर है, इसको सुरक्षित रखते हुए रीवा के तराई क्षेत्र में नीलगाय की जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण किया जा सकता है।
प्रो. रहस्यमणि मिश्रा, पर्यावरण एवं जीव विज्ञान विशेषज्ञ
(अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के पूर्व कुलपति

वन्यजीवों की संख्या एक नजर में

रीवा

तेंदुआ- 8
भालू- 42
नीलगाय- 3852
जंगली सूअर- 1374
भेड़िया- 25
लकड़बग्गा- 128
चीतल- 108
सांभर- 186
हिरण-76
चौसिंगा-11
चिंकारा-92
लोमड़ी-147
सियार- 779
मोर-330
बाघ- 3


सतना-

टाइगर- 5
इंडियन वोल्फ-40
हाइना-128
हिरन-145
वाइल्ड डॉग-09
लेपर्ड-122
इंडियन फॉक्स-169
गोल्डन जैकाल-696

सीधी

बाघ- 21
तेंदुआ-10
भालू-340
जंगली सूअर-3005
लकड़बग्गा-118

✍✍✍✍---  पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग- vindhya pradesh the land of white tiger

Thursday, January 9, 2020

सफेद बाघ को फिर से विंध्य के जंगल में बसाया जायेगा (There will be again attempt to settle the white tiger to forest of vindhya )

सफेद बाघ को फिर से विंध्य के जंगलों में बसाया जाएगा--
रीवा ,

अभी तक पर्यटकों और वन्य जीव प्रेमियों के लिए सफेद बाघ एक पहेली की तरह रहा है ,साथ ही वह आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था यदि सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले समय में सफेद बाघ विंध्य के जंगल में विचरण करते मिलेंगे। वर्ष 2012 से इस संबंध में पहल की जा रही थी लेकिन पहली बार सफेद बाघ को खुले जंगल में छोड़ने के लिए विशेषज्ञ ने सरकार को हरी झंडी दे दी गयी है ।
आठ साल पहले प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल कंजर्वेशन ऑथॉरिटी ऑफ़ इंडिया से सफ़ेद बाघो को जंगल में बसाये जाने को लेकर पत्र लिखा था उस समय N.T.C.A.  ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था । लेकिन उसके बाद से सफ़ेद बाघो पर लगातार शोध किये गए और अब एक माह पूर्व भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एनटीसीए की रिपोर्ट के बाद सरकर को पत्र लिखकर सफ़ेद बाघ को जंगल में खुला छोड़े जाने पर सहमति दे दी है । इस संबंध में प्रदेश सरकार द्वारा चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन (वन बल प्रमुख) को पत्र लिखकर इस दिशा में संभावना तलाशे जाने को कहा है ।
चूँकि विंध्य की धरती सफेद बाघ की जन्मभूमि रही है । इसलिए स्वाभाविक रूप से यहाँ का दावा सबसे पहले बनता है। उम्मीद है सरकार यही के जंगल में सफ़ेद बाघ को बसाने की योजना बनायेगी।

रॉयल बंगाल टाइगर से अलग --

अभी तक विशेषज्ञ यह मानते रहे की सफ़ेद बाघ रॉयल बंगाल टाइगर (पीले बाघ) से अलग नहीं है बस यह जीन से संक्रमण के कारण सफ़ेद रंग के हो गए हाल ही में सामने आयी रिपोर्ट में लंबे शोध के बाद यह माना गया कि बास्तविक रूप से सफेद बाघ अन्य बाघो से अलग प्रजाति के है। यह बात अलग है कि इन्हें फिलहाल जंगल में खुला इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता है कि यह अभी केवल चिड़ियाघरों और सफारी में ही है। जंगल में खुला छोड़ने के लिए लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा । तब कही जाकर यह खुले जंगल में रह पाएंगे।

प्रदेश में अभी सिर्फ नौ सफेद बाघ है  ---

मध्य प्रदेश में अभी चिड़ियाघरों में कुल 9 सफ़ेद बाघ मौजूद है ।इनमें विंध्य के महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में एवं इंदौर के चिड़ियाघर में  सफेद बाघ मौजूद है । खुले जंगल में अभी एक भी बाघ नहीं है । देश और दुनिया में जितने सफ़ेद बाघ है। वह सभी चिड़ियाघर में ही है ।  विश्व में पहली बार व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में एक निर्धारित क्षेत्र में उन्हें खुला छोड़ा गया है। मुकुंदपुर जू में लाईनेस बच्चो को जन्म भी दिया लेकिन सफेद बाघ का कुनबा अभी बढ़ना शेष है। सफारी प्रबंधन को उम्मीद है कि आने वाले समय में यहाँ सफेद बाघ का प्रजनन हो सकेगा इस संबंध में भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ  ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भी रिपोर्ट दे दी है।

सभी सफेद बाघ मोहन के ही वंशज है ---

विंध्य क्षेत्र सफेद बाघ की जन्मभूमि है । सन 1952 में तत्कालीन रीवा राज्य के महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव को शिकार के दौरान जंगल में सफेद शेर (बाघ) का शावक मिला था जिसे पकड़कर गोविन्दगढ़ किले में परवरिश की गयी और उसका नाम मोहन रखा गया ।
मोहन से 34 बाघ पैदा हुए । आज देश और दुनिया में जहाँ भी सफ़ेद बाघ है वह मोहन के ही वंशज है जानकारी के मुताबिक देश में इस समय 114 सफ़ेद बाघ विभिन्न चिड़ियाघरों में मौजूद है।
शोध में यह भी कहा गया है कि जंगल में संघर्ष करके अपने आप को सर्बाइब करने में पूरी तरह सक्षम है वशर्ते इसके लिए एक कारगार बाघ प्रोजेक्ट की जमीन तैयार की जाये ।

✍️✍️✍️.. पंडित पंकज द्विवेदी संचालक ब्लॉग- vindhya pradesh the land of white tiger

Tuesday, December 31, 2019

नए साल 2020 पर शारदा माता मंदिर मैहर में उमड़ेगी भक्तो की आस्था यहाँ देश विदेश से आने वाले भक्तों का लगेगा ताँता400 जवान तैनात किये गए सुरक्षा व्यवस्था के लिए


नए साल 2020 के आगाज के लिए इस साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर से ही मैहर में चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था कर दी गयी है। मैहर दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए 400 जवानों का बल मंगलवार की शाम 4 बजे लगा दिया गया है। यह पुलिस बल एक जनवरी के दिन भी मौजूद रहेगा। रक्षित निरीक्षक सत्य प्रकाश मिश्रा ने बताया कि हर साल की तरह इस बार भी मैहर में सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के प्रभारी एएसपी रहेंगे।

इनके साथ 4 डीएसपी, 10 टीआई ड्यूटी में होंगे। नौवीं बटालियन रीवा से एसएएफ की दो कंपनी ड्यूटी के लिए आ रही है। 100 होमगार्ड जवान होंगे और 200 जिला पुलिस बल के अधिकारी व कर्मचारी लगाए जाएंगे। सीसीटीवी कैमरों को भी दुरुस्त कर लिया गया है। साथ ही पुलिस कंट्रोल रूम में भी कमियों को पूरा किया जा रहा है ताकि मैहर में आने जाने वाले दर्शनार्थियों पर कैमरे की मदद से भी नजर रखी जा सके।



क्या है मैहर मंदिर का महत्व
कहते हैं मां हमेशा ऊंचे स्थानों पर विराजमान होती हैं। जिस तरह मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए भक्त वैष्णो देवी तक पहुंचते हैं। ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी 1063 सीढ़ियां लांघ कर माता के दर्शन करने जाते हैं। सतना जिले की मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर कहा जाता है। मैहर का मतलब है मां का हार। मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। मां शारदा देवी का मंदिर पर्वत की चोटी के मध्य में। देश भर में माता शारदा का अकेला मंदिर सतना के मैहर में ही है। इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरवी, भगवान, हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमती माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।

_________✍✍✍ पंडित पंकज द्विवेदी
संचालक ब्लॉग - vindhya pradesh the land of white tiger


नए साल के प्रथम दिवस महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर में नहीं होगा साप्ताहिक अवकाश




महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर एवं व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर हर बुधवार को बंद रहता है ।लेकिन इस मर्तबा नए साल का पहला दिन बुधवार को है। लेकिन इसे खोलने के लिए सेंट्रल जू अथॉरिटी ऑफ इंडिया से अनुमति ले ली गयी है  क्योंकि बड़ी संख्या में पर्यटक नए साल का जश्न मनाने यहाँ पर आते है।

न्यू ईयर सेलिब्रेशन के लिए चिड़ियाघर तैयार है सारी तैयारियां कर प्रबंधन ने पूरी कर ली है । वन रेंजों से कर्मचारी मांगे गए है । भीड़ को ध्यान में रखते हुए टिकट के 8 काउंटर बनाये गए है पर्यटकों को सफारी घुमाने के लिए 3 बसे लगायी जायेगी दो दिन जू में जमकर भीड़ रहेगी।
ज्ञात हो की हर साल नए साल को रात में जश्न और दिन में लोग पर्यटन का आनंद उठाते है । महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर और वाइट टाइगर सफारी में इस दिन भारी भीड़ रहती है । पिछले साल 15 से 20 हजार के करीब लोगो ने नये साल में चिड़ियाघर पहुंचकर पर्यटन का मजा लिया था  जिससे वन विभाग को 4 से 5  लाख के करीब आय हुई थी।
इस मर्तबा भी कुछ इसी तरह की भीड़ की उम्मीद की जारही है । भीड़ को देखते हुए प्रबंधन ने पहले ही तैयारी कर ली है । 1 जनवरी को स्पेशल व्यवस्थाएं रहेगी । टिकट काउंटर इसदिन बढाकर 8 कर दिए है पहले यह संख्या 2 थी ।





पर्यटकों की संख्या को देखते हुए विशेष इंतजाम किये जायेंगे --

भीड़ को देखते हुए प्रबंधन की भी व्यवस्था की है । जिसमे रीवा और सतना के वनकर्मियों को भी बुलाया गया है।
पूर्व में भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया था जिसके चलते इसबार चौकसी बरती जा रही है ।
भीड़ के दौरान यदि किसी को स्वास्थय संबंधी दिक्कते होती है तो तुरंत उपचार की व्यवस्था कराई जाएगी। इसके अलावा किसी अनहोनी को रोकने के लिए फायर बिग्रेड भी मौके पर मौजूद रहेगा ।


✍✍✍--- पंडित पंकज द्विवेदी
 संचालक ब्लॉग - vindhya pradesh the land of white tiger

Monday, November 25, 2019

बांधवगढ़: शयन मुद्रा में भगवान विष्णु


ये है शिवपुराण का रहस्यमयी पहाड़
सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।


अब तक आपने भगवान विष्णु की अनेक प्रतिमाएं देखी होंगी। क्षीर सागर में विश्राम मुद्रा में उनका स्वरूप कम ही देखने मिलता है। आज हम आपको ऐसे ही स्थान पर ले जा रहे हैं। जो है तो एक किले में लेकिन राष्ट्रीय उद्यान के लिए पहचाना जाता हैै। भगवान विष्णु की विशालकाय प्रतिमा अति आकर्षक एवं रहस्यात्मक है। मध्यप्रदेश उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ में। जिसे आमतौर पर लोग नेशनल पार्क के लिए जानते हैं। इस अद्भुत किले बांधवगढ़ का नाम यहां मौजूद एक पहाड़ के नाम पर ही रखा गया है और इस पहाड़ पर ही स्थित है ये रहस्यमयी किला जिसका निर्माण करीब 2 हजार साल पहले कराया गया था। सिर्फ किला ही नही ये पूरा का पूरा पहाड़ ही रहस्यमय और अद्भुत है। आज हम आपको बांधवगढ़ के इसी किले, पहाड़ के बारे में बता रहे हैं।

राजा व्याघ्रदेव रीवा रियासत के महाराज द्वारा इसके निर्माण की जानकारी सामने आती है। इसका उल्लेख नारद-पंच और शिव पुराण में भी मिलता है। इस किले के अंदर जाने के लिए एक ही मार्ग है, जो घने जंगलों से होकर जाता है। इसके अंदर एक सुरंग बनी हुई थी जो सीधे रीवा निकलती थी।



राजा गुलाब सिंह और उनके पिता मार्तण्ड सिंह जुदेव इसका इस्तेमाल खूफिया किले के रूप में करते थे। यहां कई गुप्त रणनीतियां बनायीं जाती थीं। किले की सीमा में ही भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्रतिमाएं पत्थरों को तलाशकर बनाई गई हैं। इनमें कच्छप स्वरूप और शेष शैया पर आराम की मुद्रा में भी भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं।



कहते हैं कि भगवान राम ने लंका से लौटकर लक्ष्मण के लिए यहां एक किला बनवाया था। इसमें कितना सत्य और कितना मिथक है ये नही कहा जा सकता। अब किले के आस-पास जंगलों में टाइगर और दूसरे खतरनाक जानवर घूमते हैं। बताते हैं कि बांधवगढ़ में माघ, मौर्य, वाकाटक, सेंगर, कलचुरी और बघेलों ने राज किया।

Bandhavgarh fort




इस किले का इतिहास टीपू सुल्तान से जुड़ा होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि 6 माह के लगातार प्रयास के बाद भी वह इस पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था। यही नही यहां अंदर सात ऐसे तालाब हैं जो अब तक कभी भी सूखे नही हैं। किसी भी मौसम में इनमें पानी लबालब भरा रहता है। अब यहां की देखरेख शासन द्वारा की जाती है। घने जंगल और सघन मार्ग होने की वजह से अब किले के अंदर जाने पर रोक लगा दी गई है।


-पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
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Sunday, November 24, 2019

देउर कोठार : जहा 2 हजार साल प्राचीन बौद्ध स्तूपो और 5 हजार साल प्राचीन शैल चित्रों की श्रृंखला

रीवा। देउर कोठार का नाम केवल देश के इतिहासकार ही नहीं लेते हैं बल्कि विदेशों में भी इसका पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व है। यहां लगभग 2 हजार वर्ष पुराने बौद्ध स्तूप और लगभग 5 हजार वर्ष प्राचीन शैलचित्रों की श्रृंखला मौजूद है। जो 1982 में प्रकाश में आए थे। ये स्तूप सम्राट अशोक के शासनकाल में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के निर्मित हैं।
देउर कोठार स्थान, रीवा-इलाहाबाद मार्ग एचएन-27 पर सोहागी पहाड़ से पहले कटरा कस्बे के समीप स्थित है। यहां मौर्य कालीन मिट्टी ईट के बने 3 बड़े स्तूप और लगभग 46 पत्थरों के छोटे स्तूप बने है। अशोक युग के दौरान विंध्य क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ और भगवान बौद्ध के अवशेषों को वितरित कर स्तूपों का निर्माण किया गया।

बौद्ध स्तूपों की सबसे बड़ी श्रंखला
देउर कोठार के बौद्ध स्तूपों का समूह सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप समूह है जिसमें पहला बौद्ध स्तूप ईंटों द्वारा बनाया गया था। एक मौर्यकालीन स्तम्भ भी है जिसमें एक शिलालेख भी है जिसकी शुरुआत भगवतोष् से होती है। पुरातत्ववेत्ता नारायण व्यास बताते हैं कि देउर कोठार में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई कराई जा रही थी। जिनकी टीम में वो भी शामिल थे। जिसमें उन्हें मन्नत शिलालेखों के साथ साथ कुछ रेलिंग के टुकड़े भी मिले थे। देउर कोठार पर आधारित एक पुस्तिका का भी प्रकाशन हुआ है।

कभी यहां से था व्यापारिक मार्ग
 यह क्षेत्र कौशाम्बी से उज्जैनी अवंतिका मार्ग तक जाने वाला दक्षिणपक्ष का व्यापारिक मार्ग था। इसी वजह से बौद्ध के अनुयायियों ने यहां पर स्तूपों का निर्माण किया होगा। ऐसा कहा जाता है कि देउर कोठार में भरहुत से अधिक प्राचीन स्तूप है। यहां बौद्ध भिक्षू अत्यात्मिक स्थल बनाकर शिक्षा-दिक्षा और साधना करते रहे होगें। इसके प्रमाण यहां मिलते है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों का विंध्य क्षेत्र शिक्षण केन्द्र था। इसके प्रमाण देउर कोठार मे मिलते है। यहां पर खुदाई के दौरान मौर्य कालीन ब्राही लेख के अभिलेख, शिलापट्ट स्तंभ और पात्रखंड बडी संख्या में मिले।
यहां से आते हैं बौद्ध धर्मावलम्बी
श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, भूटान, थाईलैंड, चीन आदि जैसे देशों से बौद्ध धर्मावलम्बी भारी संख्या में देउर कोठार आते हैं। वो सबसे ज्यादा बौद्ध स्तूपों को ही देखना पसंद करते हैं और उन पर शोध भी करते हैं। देउर कोठार सहित सतना में भरहुत, मानपुर के बौद्ध स्तूपों को राष्ट्रीय बौद्ध टूरिज्म सर्किट में शामिल किए जाने की चर्चा है। अगर ऐसा होता है तो इन देशों के बौद्ध धर्मावलम्बी की संख्या बढ़ेगी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

- पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

Wednesday, November 13, 2019

TAMRA Rewa

TAMRA REWA-
 Tamra is a village in huzur tehsil,Rewa district madhya pradesh india.its a Rewa division,located 12 km south of Rewa city by Nipania-Tamra Road,satna 51 km to the east of district and 478 km from the state capital bhopal.tamra pincode is 486006.the head post office is at chorahta.

The nearest village are bansi(2km),amiri ti(3km),mukundpur(1.5km),govind garh(10km),rausar(6km),nipaniya(11 km),

The nearest cities are Rewa,satna,sidhi,singrauli,shahdol, allhabad,govindgarh,maihar,chitrakoot etc. The local language are hindi and bagheli

TOURIST PLACE
1. Padui hanuman mandir Tamra

2. Devi dai mata mandir

3.world first  White tiger safari mukundpur(near1.5 km)


Saturday, September 14, 2019

सफेद बाघ मोहन ने दी विंध्य को नई पहचान



बाघों की प्रजाति में सफेद बाघों की अपनी अलग पहचान है। दुनिया में वर्तमान में जहां भी सफेद बाघ हैं, उन सबका डीएनए विंध्य और रीवा से जुड़ा हुआ है। पहला जीवित सफेद बाघ मोहन के रूप में पकड़े जाने का दावा है। बात 27 मई 1951 की है जब सीधी जिले के कुसमी क्षेत्र के पनखोरा गांव के नजदीक जंगल में बाघिन का शिकार करने महाराजा मार्तण्ड सिंह के साथ शाही मेहमान जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह पहुंचे थे। तीन शावक तो जंगल की ओर भाग गए लेकिन सफेद रंग वाला वहीं पर एक गुफा में छिप गया। जिसे मारने के बजाय मार्तण्ड सिंह ने पकडऩे की योजना बनाई। पिंजड़ा लगाकर उसे पकड़ा गया। मोहन को पकडऩे से लेकर आखिरी सांस तक के केवल एक ही गवाह के रूप में पुलुआ बैरिया बचे हैं।
पुलुआ बताते हैं कि बात 1951 की है, जब महाराजा मार्तण्ड सिंह गोविंदगढ़ किले में बाघ को लेकर आए। पूरा क्षेत्र देखने के लिए उमड़ रहा था, मैं भी बालक था तो सबके साथ गया। परिवार के कुछ लोग किले में काम करते थे, वह जब बाघ को भोजन देने के लिए जाते तो मैं भी नजदीक से देखने की उत्सुकता के लिए जाता। कम उम्र का होने के चलते बाघ की नजर हमारी तरफ अधिक रहती थी। महाराजा को पता चला तो उन्होंने हमारी ड्यूटी ही मोहन की सेवा में लगा दी। उसके बाद से लगातार सेवाएं देते रहे। बाघ का नाम मोहन रखा गया, वह जंगल का राजा होता है तो हम सब राजा की तरह ही उसे सम्मान देते थे।
जितने केयर टेकर थे, सब मोहन सिंह इधर आइए-मोहन सिंह उधर जाइए, इस तरह की सम्मानित भाषा का प्रयोग करते थे। हम सब के अलावा मोहन किसी को नजदीक से जानते थे तो वह थे महाराजा मार्तण्ड सिंह। अक्सर दोपहर के बाद महाराजा फुटवाल लेकर मोहन के बाड़े के पास पहुंचते थे। ऊपर छत पर बैठकर वह बाड़े की दीवाल की ओर बाल फेंकते तो मोहन उसे पकडऩे के लिए दौड़ते थे। यह दृश्य बहुत ही आकर्षक होता था। कई बार तो ऐसे भी अवसर आए जब महाराजा ने मोहन के नजदीक तक जाकर सिर पर हाथ फेरा। सुबह नौ बजे मांस देने का समय होता था, इसमें थोड़ा सा भी विलंब होने पर मोहन दहाड़ लगा देते, मतलब पूरा किला सक्रिय हो जाता था।
रविवार के दिन मोहन खाना नहीं खाते थे, शुरुआत में इसे सामान्य रूप में लिया गया लेकिन जब लगातार वह उस दिन मांस देने के बाद नहीं खाते थे, तो महाराजा ने कहा कि इस दिन मांस नहीं दिया जाए। इसके बाद से दो लीटर दूध उस दिन दिया जाने लगा। बाद में बीमार होने पर इंग्लैंड के डॉ. वेल्सन ने लंबे समय तक देखरेख की और उन्होंने नए सिरे से आहार की मात्रा निर्धारित की थी। एक बार तो दूसरे केयर टेकर ने बाड़े के भीतर जाने वाले दरवाजे को बंद ही नहीं किया, भोजन देने की तैयारी चल रही थी कि मोहन उसी स्थान पर आकर खड़े हो गए, पीछे से उनके छूने का एहसास हुआ तो एक झटके में मन दहशत में भर गया। लेकिन कोई हरकत किए बिना इशारा किया कि बाड़े में चालिए, तो वह चले गए। अन्यथा बाहर निकलने का रास्ता खुला था, उस दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता था। मौत से कुछ समय पहले मोहन के पैर में उनके लकवा मार गया था। हम सब आखिर तक देखरेख करते रहे। 10 दिसंबर 1969 को मोहन का निधन हो गया, वह जीवन का सबसे बड़ा सदमा था, जिसे आज तक नहीं भूला। कोई भी सफेद बाघ देखता हूं तो मोहन की याद ताजा हो जाती है।


मुकुंदपुर में ली शरण
पुलुआ बताते हैं कि गोविंदगढ़ किले में मोहन को रखे दो दिन का ही समय हुआ था कि रात्रि में दीवाल फांदकर वह भाग निकले। महाराजा ने चारों ओर तलाश कराई तो मुकुंदपुर के मांद रिजर्व क्षेत्र के जंगल में मिले। वह क्षेत्र बाघों के लिए प्रिय माना जाता है, अब वहीं पर टाइगर सफारी और चिडिय़ाघर बना दिया गया है। इसके पहले अन्य बाघ भी इस क्षेत्र में रहते थे।

राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
मोहन की मौत की जानकारी देते समय केयर टेकर पुलुआ की भी आंखें भर आई। उन्होंने बताया कि उस दिन रीवा में राजकीय शोक घोषित किया गया था। बांधवगद्दी के राजसी ध्वज में पार्थिव शरीर ढंका गया। बंदूकें झुकाकर सलामी दी गई। पुलुआ के अनुसार उस दिन महाराजा मार्तण्ड सिंह ने कहा था कि आज हमने अपनी बहुमूल्य धरोहर खो दी है। मौत के कई घंटे तक महाराजा एकांत में रहे। कहा जाता है कि किसी बाघ या अन्य जानवर को मरने के बाद इस तरह सम्मान इसके पहले और अब तक नहीं मिला है। कई दिनों तक शोक सभाएं हुई।

मोहन का सफर
27 मई 1951 को सीधी जिले के कुसमी क्षेत्र के पनखोरा गांव के नजदीक जंगल में पकड़ा गया। सफेद शावक मोहन को गोविंदगढ़ किले में रखा गया। 1955 में पहली बार सामान्य बाघिन के साथ ब्रीडिंग कराई गई, जिसमें एक भी सफेद शावक नहीं पैदा हुए। 30 अक्टूबर 1958 को मोहन के साथ रहने वाली राधा नाम की बाघिन ने चार शावक जन्मे, जिनका नाम मोहिनी, सुकेशी, रानी और राजा रखा गया। 19 वर्षों तक जिंदा रहे तीन मादाओं के साथ मोहन के संसर्ग गोविंदगढ़ में लगातार सफेद शावक पैदा होते गए। मोहन से कुल 34 शावक जन्मे, जिसमें 21 सफेद थे। इसमें 14 राधा अकेले नाम की बाघिन के थे। गोविंदगढ़ किले में 6 सितंबर 1967 को मोहन और सुकेशी से चमेली जन्मी और 17 नवंबर 1968 को विराट नाम का सफेद शावक जन्मा। 10 दिसंबर 1969 को मोहन की मौत के बाद गोविंदगढ़ किला परिसर में ही राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। 1972 में मोहन की मौत के बाद सुकेशी नाम की बाघिन को दिल्ली के चिडिय़ाघर भेजा गया। 1973 में चमेली को लेकर मोहन के केयर टेकर पुलुआ बैरिया को भी दिल्ली बुला लिया गया। 2003 तक दिल्ली के चिडिय़ाघर में उन्होंने सेवाएं दी। 8 जुलाई 1976 को आखिरी बाघ के रूप में बचे विराट की भी मौत हो गई। इसके बाद 40 साल तक सफेद शेरों से रीवा वीरान रहा। 9 नवंबर 2015 को ह्वाइट टाइगर सफारी में विंध्या को लाया गया, वर्तमान में चार सफेद और तीन पीले बाघ हैं।

मोहन और उसके वंशज सफेद बाघों ने कई अवसरों पर रीवा सहित पूरे विंध्य का गौरव बढ़ाया है। दुनिया में जहां भी सफेद बाघ हैं, उनके वंशजों की चर्चा होगी तो इस क्षेत्र का नाम जरूर लिया जाएगा। वर्तमान में दुनिया की पहली ह्वाइट टाइगर सफारी जो अब तक इकलौती ही मुकुंदपुर में है। 25 हेक्टेयर क्षेत्रफल जंगल में सफेद बाघों को खुले में रखा गया है, ताकि वह जंगल के वातावरण का एहसास कर सकें,एवं 75 हेक्टेयर में चिड़ियाघर बनाया गया है जिसमे विभिन्न 640 प्रकार के जानवर रखे जाएंगे अभी सफ़ेद बाघ और पीले बाघ के अलावा 1 जोड़ा बब्बर शेर का और भालू,चीता, तेंदुआ,हिरण,काला हिरण,चिंकारा,कांकर, चीतल,नील गाय,जंगली सूअर,इत्यादि है तथा अभी और बाड़े का निर्माण हो रहा है जल्द ही और नए जानवर आने वाले है ।

1987 में डाक टिकट
मोहन के चलते कई बार क्षेत्र का नाम रोशन हुआ है। भारत सरकार के डाक और दूरसंचार विभाग ने 1987 में डाक टिकट जारी किया। यह कार्यक्रम रीवा में ही आयोजित किया गया और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री ने इसे जारी किया था। इसमें मोहन की फोटो लगाई गई। उनदिनों डाक टिकटें बड़ी संख्या में प्रसारित होती थी।

जानवरों का पहली बार बीमा
देश में जानवरों का पहली बार बीमा सफेद बाघ मोहन का ही हुआ था। एक समारोह में मोहन को दिल्ली ले जाया गया था, उस दौरान ढाई लाख रुपए का बीमा कराया गया था। सुरक्षा के लिए दो विशेषज्ञ भी भेजे गए थे।

अमेरिका की शान बनी मोहिनी
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति की इच्छा के बाद मोहिनी नाम की सफेद बाघिन को 5 दिसंबर 1960 को अमेरिका ले जाया गया। जहां पर ह्वाइट हाउस में भव्य स्वागत किया गया।

राजपथ पर झांकी
26 जनवरी 2016 को दिल्ली के राजपथ में गणतंत्र दिवस के अवसर पर सफेद बाघों की झांकी मध्यप्रदेश सरकार की ओर से प्रदर्शित की गई।

Monday, July 29, 2019

खंधो काली माता मंदिर गोविन्दगढ़

खंधो मंदिर गोविन्दगढ़ पहाड़ -
यह मंदिर गोविन्दगढ़ नगर के दक्षिणी पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर काली माँ को समर्पित है इसी मंदिर के समीप ग्यारह और मंदिर है जिनमे संतोषी माता ,दुर्गा माता,फूलमती माता ,मरी माता,विष्णु भगवान ,हनुमान जी,शंकर जी,पार्वती माता और गणेश जी की मंदिर स्थापित है, किंतु सोमवार को यहाँ अधिक श्रद्धालु एकत्र होते है। मकर संक्रांति को यहाँ मेला लगता है।





खंधो मंदिर के समीप पूर्व दिशा में एक कुंड है। कैमूर पहाड़ी पर स्थित एक झील का पानी इस कुंड में गिरता है और इस प्रकार एक प्रपात का निर्माण होता है। कुंड 20 फीट चौड़ा और 40 फीट लंबा है। यह स्थान पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है

रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम

👉#रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम 👉प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi बनारस से वर्चुअली करेंगे रीवा एयरपोर्ट ...