Thursday, December 31, 2020

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER की तरफ से नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं (कैलेंडर 2021)

 आप सबको नमस्कार मैं नये साल के शुभ अवसर पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।  आप सब स्वस्थ रहे मस्त रहे।यही  भगवान से प्रार्थना करता हूं ।

नववर्ष 2021 का कैलेंडर VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER  ब्लॉग की तरफ से आप सबके लिए कैलेंडर  पोस्ट कर रहा हूँ। 

इस कैलेंडर में विंध्य क्षेत्र के धार्मिक स्थल एवं पर्यटक स्थल की फ़ोटो भी डाला गया है जिससे लोगों को विंध्य के धार्मिक स्थलों एवं पर्यटक स्थलों के बारें में जानकारी हो सके । 

कैलेंडर डाउनलोड करने के लिए लिंक-  https://drive.google.com/file/d/1gAhrWnGMOUGSJlZMnB0iZKELZxuHrgNe/view?usp=drivesdk

अभी तक आप लोगों ने हमारे ब्लॉग को इतना प्यार एवं सहयोग दिया है आशा करता हूं कि आप लोग आगे भी ऐसे ही प्यार एवं सहयोग देंगे।

धन्यवाद 🙏🙏



©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

©Pankajdwivedi
©Pankajdwivedi

✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी , संचालक ब्लॉग

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER 

Monday, November 23, 2020

ईको टूरिज़्म पार्क पर्यटको के आकर्षण का केंद्र होगा-मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी के पास ईको टूरिज्म एडवेंचर पार्क का शुभारम्भ( Eco tourism park may be the centre of attraction to tourists, mukundpur near white tiger safari in eco tourism adventure park opening now. )

 ईको टूरिज़्म पार्क पर्यटको के आकर्षण का केंद्र होगा-मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी के पास ईको टूरिज्म एडवेंचर पार्क का शुभारम्भ

ईको पार्क मुकुन्दपुर

Eco tourism park may be the centre of attraction to tourists,  mukundpur near white tiger safari in eco tourism adventure park opening now.


 पर्यटन के लिहाज से विंध्य क्षेत्र ने रविवार को मील का एक और पत्थर पार कर लिया। विंध्य के सतना जिले के मुकुंदपुर  को व्हाइट टाइगर सफारी के बाद अब एडवेंचर पार्क  की सौगात भी मिल गई है। पर्यटकों को आकर्षित करने के साथ ही इको टूरिज्म से जुड़ा यह एडवेंचर पार्क   रीवा , सतना ,सीधी सहित विंध्य क्षेत्र के लोगों के मनोरंजन के लिहाज से एक बेहतर पिकनिक स्थल भी बन गया है। रविवार को एक गरिमामय समारोह में प्रदेश के पंचायत राज्य मंत्री रामखेलावन पटेल ने सतना सांसद गणेश सिंह , रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा तथा रीवा के विधायक व प्रदेश के पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ल की मौजूदगी में मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी के समीप इस एडवेंचर पार्क का लोकार्पण किया।

  



मौज मस्ती के साथ साहसिक कारनामे


जो अब तक आपने रील लाइफ में देखा है वो अब रियल लाइफ में आप खुद भी कर सकेंगे । अब आप अपने परिवार अथवा दोस्तों के साथ घूमने – फिरने , छुट्टियां और पिकनिक मनाने जा सकेंगे।  मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी   के साथ साथ अब एडवेंचर्स पार्क में भी मनोरंजन और मौज मस्ती करने की एक ऐसी जगह अस्तित्व में आ गई है जहां बच्चे तो बच्चे बड़ों का भी मन खूब रमेगा। ईको टूरिज्म के तहत विकसित किये गए एडवेंचर्स पार्क में बच्चे झूले झूल सकेंगे, खेलकूद सकेंगे और अब तक फिल्मों और टेलीविजन शो में दिखाई पड़ने वाले साहसिक कारनामों का भी मजा ले सकेंगे। सतना वन मंडल द्वारा बनाया गया यह इको पार्क मुकुंदपुर में व्हाइट टाइगर सफारी एवं जू सेंटर के समीप ही बनाया गया है ताकि टाइगर सफारी का भ्रमण करने आने वाले लोग विंध्य की शान सफ़ेद शेर के दीदार के साथ ही एडवेंचर पार्क में भी मौज मस्ती कर सकें।





रस्सी पर चलिए , तार पर झूल कर नदी पार करिये-






विंध्य क्षेत्र  में अपनी किस्म के इस इकलौते पार्क में रोप वाकिंग, रोप क्लाइम्बिग, टायर वाक, जिप लाइन, कैनोपी वाक, साइकिलिंग व तीरंदाजी आदि जैसी साहसिक गतिविधियों के साथ बच्चों के लिये कई तरह के झूले लगाये गये हैं ताकि बड़े व बच्चे सभी इसका आनंद उठा सकें। वनमंडलाधिकारी राजीव कुमार राय ने बताया कि आने वाले समय में यहां और भी कई एडवेंचर्स गतिविधियां शुरू किये जाने के प्लान पर काम चल रहा है। योजना है कि यहां वाटर स्पोर्ट्स की भी कुछ गतिविधियां शुरू की जाएं। पार्क में औषधीय और ग्रहों – नक्षत्रों से जुड़े वृक्षों – पौधों का उद्यान भी विकसित किया गया है। मुकुंदपुर के जंगलों के प्राकृतिक सौंदर्य को सुरक्षित और संरक्षित रखते हुए विकसित किये गए इस पार्क में ट्री हाउस, वाच टावर्स आदि भी बनाये गए हैं।


मुकुंदपुर से मार्कण्डेय तक बनाएंगे पर्यटन कॉरिडोर –  पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री राम खेलावन पटेल


प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रामखेलावन पटेल ने एडवेंचर्स पार्क के लोकार्पण अवसर पर विंध्य की झोली में आई इस एक और सौगात का श्रेय रीवा के विधायक एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र शुक्ला को देते कहा कि विंध्य को विकास की ऊंचाइयों तक ले जाने में श्री शुक्ल का विशेष योगदान है। उन्होंने कहा वाइट टाइगर सफारी एवं जू को विंध्य के लिए एक धरोहर बताते हुए कहा कि इको टूरिज्म इसकी पूर्णता सिद्ध करेगा। यह स्थान पर्यटकों को आकर्षित करेगा। मंत्री श्री पटेल ने कहा कि मुकुंदपुर से रामनगर के मार्कण्डेय तक एक पर्यटन कॉरिडोर बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं ताकि पर्यटकों को ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व के स्थलों को देखने – जानने का मौका मिल सके।


उन्होंने मुकुंदपुर तालाब का जीर्णोद्धार कराने , पुलिस चौकी की स्थापना कराने का भरोसा दिलाया तथा टाइगर सफारी का एक गेट मुकुंदपुर की तरफ किये जाने का प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश विभागीय अधिकारियों को दिए।


देश – विदेश में बनेगी पहचान –सतना सांसद गणेश सिंह



कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सांसद सतना गणेश सिंह ने कहा कि व्हाइट टाइगर सफारी ने विश्व में अपनी अलग पहचान स्थापित की है। अब विकास के दूसरे चरण में ईको टूरिज्म पार्क की पहचान भी देश व विदेश में बनेगी। विन्ध्य की धरा में धार्मिक, प्राकृतिक सौंदर्य के साथ खनिज संपदाओं के प्रचुर भण्डार हैं। पार्क के प्रारंभ हो जाने से पर्यटक इन सबका दीदार कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि रीवा विधायक श्री शुक्ल के प्रयासों से यह क्षेत्र औद्योगिक कॉरीडोर से जुड़ेगा तथा इसका चहुंमुखी विकास होगा।


संयुक्त प्रयासों का फल – रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा



कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सांसद रीवा जनार्दन मिश्र ने कहा कि रीवा संभाग में पर्यटन के विकास के लिये किये गये संयुक्त प्रयासों का ही फल है कि आज यह क्षेत्र सैलानियों को प्रकृति के सौंदर्य के दर्शन के साथ मनोरंजन के भी संसाधन उपलब्ध करा पा रहा है।


होगी क्षेत्र की तरक्की बढ़ेंगे आय के माध्यम – पूर्व मंत्री व रीवा विधायक  राजेंद्र शुक्ल


इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर अपने उद्बोधन में पूर्व मंत्री एवं रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि व्हाइट टाइगर सफारी में आने वाले पर्यटकों को ईको टूरिज्म पार्क सोने में सुहागा जैसा है। व्हाइट टाइगर सफारी एवं जू में आने वाले सैलानी वन्य प्राणियों को देखने के साथ पार्क में एडवेंचर का पूरा मौका उठा सकेंगे। भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोग वन्य प्राणियों के दीदार के साथ टूरिज्म पार्क में सुकून के दो पल बिता सकेंगे। यहां बच्चों व बड़ों के लिये मनोरंजन के पूरे इंतजाम किये गये हैं जिसमें लोग साहसिक गतिविधि भी कर सकेंगे।


उन्होंने कहा कि पर्यटन आर्थिक गतिविधि को बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम है। विन्ध्य में देशी एवं विदेशी सैलानियों के आने से क्षेत्र की तरक्की होगी तथा यह समृद्धशाली क्षेत्र के तौर पर विकसित होगा। उन्होंने कहा कि विन्ध्य प्राकृतिक संपदा से सम्पूर्ण क्षेत्र है। इसे पर्यटन का केन्द्र बनाया जायेगा तथा पर्यटन कॉरीडोर से जोड़ने के सभी कार्य कराये जायेंगे। फोरलेन की सड़कों से जुड़ जाने के कारण अब यह मुख्य धारा में शामिल हो चुका है। सिंगरौली तक रेल लाइन से जुड़ जाने पर विकास के नये मापदण्ड स्थापित होंगे तथा रीवा/सतना में हवाई अड्डा बन जाने से पर्यटकों को यहां आने की सुविधा मिल जायेगी।


ये भी रहे उपस्थित –

कार्यक्रम का संचालन सुदामा शरद ने किया। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन संचालक व्हाइट टाइगर एण्ड जू संजय रायखेड़े द्वारा किया गया। इस अवसर पर कलेक्टर अजय कटेसरिया, जनपद अध्यक्ष अमरपाटन तारा विजय पटेल, सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक आरबी शर्मा, एडवोकेट सुशील तिवारी,रूपनारायण पटेल रूपए, राजेश तिवारी, विवेक दुबे, विजय पटेल सहित वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, पत्रकारगण व बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी उपस्थित रहे।




- पंडित पंकज द्विवेदी संचालक ब्लॉग 

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER

Saturday, November 21, 2020

मुकुंदपुर में मनोरंजन से भरा ईको पार्क बनकर तैयार 22 नवंबर 2020 को होगा उद्घाटन


 मुकुंदपुर में मनोरंजन से भरा ईको पार्क बनकर तैयार 22 नवंबर 2020 को होगा उद्घाटन 


मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी के बगल में ईको पार्क बनकर पूरी तरह से तैयार हो गया है। इस पार्क में मनोरंजन   के कई साधन  बनाये गए है। इस पार्क का उद्घाटन 22 नवंबर को पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री रामखेलावन पटेल करेंगे। लिहाजा जू प्रबंधन इसकी तैयारी में जुटा हुआ है।

उल्लेखनीय है कि मुकुंदपुर को पर्यटन क्षेत्र में तेजी के साथ विकसित किया जा रहा है। व्हाइट टाइगर सफारी के बाद अब ईको पार्क बनाया गया है। इस पार्क में कई तरह के झूले, प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पार्क समेत मनोरंजन के कई साधन स्थापित किये गए है। पूरी तरह से बनकर तैयार हो चुका है। उसे अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसके शुभारंभ की तिथि भी निर्धारित कर दी गईं है। प्रदेश के पिछड़ावर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री(स्वतंत्र प्रभार ),पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री रामखेलावन पटेल 22 नवम्बर को ईको पार्क का उद्घाटन करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सांसद सतना गणेश सिंह करेंगे। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रीवा के सांसद जनार्दन मिश्रा एवं पूर्व मंत्री तथा रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ल होंगे।मुख्य वन संरक्षक ऐ के सिंह एवं डीएफओ सतना राजेश कुमार राय ने कार्यक्रम में उपस्थिति का अनुरोध किया है।

ईको पार्क का निरीक्षण करते हुए पूर्व मंत्री एवं रीवा विधायक  राजेन्द्र शुक्ल जी



30 रुपये होगी इंट्री फीस


कई एकड़ में विकसित ईको पार्क में भीतर जाने के लिए पर्यटकों को 30 रुपये बतौर इंट्री फीस अदा करना होगा । इसमे वह कई तरह के झूले ,पार्क व प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठा सकेंगे। इसके खुलने का समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक रहेगा। इस दौरान पर्यटक पार्क में रह सकेंगे।


जिपलाइन , तीरंदाजी और डार्टिंग भी


बताया जा रहा है कि ईको पार्क में मनोरंजन के भरपूर साधन उपलब्ध कराए गए हैं। इसमे तीरंदाजी, डार्टिंग  और जिपलाइन भी है। लेकिन इसके लिए अलग से फीस निर्धारित की गई है। पार्क में भीतर जाने पर पर्यटको को अगर मनोरंजन का  लुफ़्त उठाना है ,तो इसकी फीस देनी होगी। जबकि झूले, पार्क और अन्य सभी साधनो को मुफ्त रखा गया है।


" ईको पार्क बनकर तैयार हो चुका है। 22 नवम्बर को माननीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री रामखेलावन पटेल  द्वारा उद्धघाटन किया जाएगा। इसके बाद पार्क पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। पार्क में मनोरंजन के कई साधन मौजूद हैं।"

संजय रायखेड़े

जू संचालक



--✍️  पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग

VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER 

Sunday, November 1, 2020

विंध्य को नहीं मिला शर्तों के अनुरूप विकास, अलग राज्य की मांग केन्द्र सरकार के पास लंबित


 मध्यप्रदेश स्थापना दिवस : विंध्य को नहीं मिला शर्तों के अनुरूप विकास, अलग राज्य की मांग केन्द्र सरकार के पास लंबित



विंध्य प्रदेश गठन की संभावनाएं अभी भी जिंदा हैं, केन्द्र के पास लंबित है मामला

- आज के दिन ही विंध्य प्रदेश का अस्तित्व समाप्त होकर मध्यप्रदेश का हुआ था गठन

- विधानसभा ने संकल्प पारित कर शासन के पास भेजा था प्रस्ताव

- लगातार होती रही उपेक्षा, अब भी बड़े प्रोजेक्ट से किया जा रहा वंचित



रीवा। मध्यप्रदेश का गठन एक नवंबर 1956 को हुआ था, उसके पहले विंध्य प्रदेश का अपना अस्तित्व था। नए प्रदेश के गठन के बाद से इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। इसमें आने वाले बघेलखंड और बुंदेलखंड के साथ अन्य कई क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा हो गए।


उस दौरान विलय के समय इस क्षेत्र में जो संसाधन दिए जाने थे, वह नहीं मिले। जिसकी वजह से फिर विंध्य प्रदेश के पुनर्गठन की मांग उठी, हालांकि विलय का भी व्यापक रूप से विरोध हुआ था, बड़ा आंदोलन हुआ गोलियां चली गंगा, चिंताली और अजीज नाम के लोग शहीद भी हुए, सैकड़ों लोग जेल भी गए लेकिन सरकारी तंत्र ने उस आवाज को शांत कर दिया था। बढ़ती मांग के चलते मध्यप्रदेश विधानसभा ने 10 मार्च 2000 को संकल्प पारित कर 'विंध्य प्रदेश' अलग राज्य गठित करने केन्द्र सरकार से मांग की थी।


यह संकल्प विधानसभा में अमरपाटन के तत्कालीन विधायक शिवमोहन सिंह ने प्रस्तुत किया था। जिसका विंध्य के सभी विधायकों ने समर्थन कर इस क्षेत्र के दावे के बारे में बताया था। उस दौरान कांग्रेस की सरकार थी, इस संकल्प का समर्थन भाजपा के विधायकों ने भी किया था। सर्व सम्मति से पारित किए गए इस प्रस्ताव के बाद तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी ने केन्द्र सरकार से कई बार इस पर विचार करने की मांग की थी।


अब तक करीब 19 वर्ष का समय बीत गया लेकिन विंध्यप्रदेश के पुनर्गठन की संभावनाएं अभी मरी नहीं हैं। केन्द्र सरकार की ओर से इस पर स्वीकृति या अस्वीकृति का कोई निर्णय नहीं दिया गया है। राजनीतिक परिस्थितियां अब फिर उसी तरह आ गई हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार है तो केन्द्र में भाजपा नेतृत्व की। राजनीतिक विरोधाभाष के बीच विंध्य प्रदेश गठन की संभावनाएं जीवित हैं।



- लोकसभा में संकल्प के अध्ययन का दिया था आश्वासन

लोकसभा में मध्यप्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2000 पेश किया गया था, चर्चा में भाग लेते हुए रीवा के तत्कालीन सांसद सुंदरलाल तिवारी ने मांग उठाई थी कि छत्तीसगढ़ के साथ ही विंध्यप्रदेश का भी संकल्प पारित हुआ है, इसके गठन की प्रक्रिया भी अपनाई जाए। उस दौरान गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि यदि जनभावनाओं के आधार पर प्रदेश सरकार ने संकल्प पारित कराया है तो इसका अध्ययन किया जाएगा और संभावनाओं पर विचार होगा। इसके बाद से विंध्यप्रदेश गठन की मांग का मुद्दा धीरे-धीरे कमजोर होता गया।



- टूटते गए विभागों के प्रदेश मुख्यालय

स्टेट रि-आर्गनाइजेशन बिल पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि जिन राज्यों का विलय हो रहा है, उनका गौरव बनाए रखने के लिए प्रदेश स्तर के संसाधन दिए जाएंगे। विंध्यप्रदेश के विलय के बाद इसकी राजधानी रहे रीवा में वन, कृषि एवं पशु चिकित्सा के संचालनालय खोले गए। पूर्व में यहां हाईकोर्ट, राजस्व मंडल, एकाउंटेंट जनरल ऑफिस भी था। धीरे-धीरे इनका स्थानांतरण होता गया। उस दौरान भी यही समझाया गया कि विकास रुकेगा नहीं, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। इसी तरह ग्वालियर में हाईकोर्ट की बेंच, राजस्व मंडल, आबकारी, परिवहन, एकाउंटेंट जनरल आदि के प्रदेश स्तरीय कार्यालय खोले गए। इंदौर को लोकसेवा आयोग, वाणिÓयकर, हाईकोर्ट की बेंच, श्रम विभाग आदि के मुख्यालय मिले। जबलपुर को हाईकोर्ट, रोजगार संचालनालय मिला था। रीवा के अलावा अन्य स्थानों पर राज्य स्तर के कार्यालय अब भी संचालित हैं, लेकिन यह केवल संभागीय मुख्यालय रह गया है।



- बड़े संस्थान देने में भी हो रही उपेक्षा

विंध्य क्षेत्र को बड़े संस्थान अन्य क्षेत्रों के तुलना में बहुत कम मिल रहे हैं। विंध्यप्रदेश पुनर्गठन को लेकर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व समन्वयक जयराम शुक्ला कहते हैं कि मध्यप्रदेश में आइआइटी, एम्स, युनिवर्सिटी सहित कई बड़े संस्थान इंदौर, भोपाल और जबलपुर को दिए जा रहे हैं। विंध्य में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, वह शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं। यहां उद्योग भी आए तो धुएं और धूल वाले। विंध्यप्रदेश की राजधानी रहे रीवा को स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट से भी अलग रखा गया। जब रीवा राजधानी था तो यह लखनऊ, पटना, भुवनेश्वर जैसे शहरों के बराबर माना जाता था। उस समय भोपाल से बड़ा इसे माना जाता था। यहां राजनीतिक जागरुकता से सबसे अधिक रही लेकिन क्षेत्र के विकास में इसका फायदा जनप्रतिनिधि नहीं दिला सके।



- ऐसा था विंध्यप्रदेश

विंध्यप्रदेश में रीवा, सीधी(सिंगरौली), सतना, शहडोल(अनूपपुर,उमरिया), पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़(निवाड़ी), दतिया आदि जिले आते थे। 1300 ग्राम पंचायतें और 11 नगर पालिकाएं थीं। विधानसभा की 60 सीटें थीं और लोकसभा की छह सीटें थी। विंध्यप्रदेश की राजधानी रीवा हुआ करती थी।

- ---

अलग प्रदेश होने से तेजी के साथ विकास होता। केन्द्रीय सेवाओं में राज्य का कोटा होता तो अधिक संख्या में अफसर तैयार होते। यहां शिक्षा और रोजगार के अवसर कम होते गए, जिसकी वजह से लोग दूसरे शहरों की ओर जा रहे हैं। सरकारों की उपेक्षा से यहां हताशा का भाव बढ़ता जा रहा है। विधानसभा का संकल्प अभी भी केन्द्र के पास लंबित है। मेरा मानना है कि अवसर जैसे-जैसे कम होते जाएंगे यहां जरूरतें बढ़ेंगी और फिर आवाज उठेगी। अलग प्रदेश का गठन आगे चलकर होगा।

शिवमोहन सिंह, पूर्व विधायक ( विंध्यप्रदेश का संकल्प प्रस्तुत करने वाले)


-पंडित पंकज द्विवेदी, संचालक ब्लॉग

Vindhya Pradesh The Land Of White Tiger 

'विंध्यप्रदेश' की हत्याकथा..! कालचक्र/जयराम शुक्ल

 हरेक को जानना जरूरी है

'विंध्यप्रदेश' की हत्याकथा..!

कालचक्र/जयराम शुक्ल



हर साल 1 नवंबर की तारीख मेरे जैसे लाखों विंध्यवासियों को हूक देकर जाती है।  मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस का जश्न  हमें हर साल चिढ़ाता है।


जो इतिहास से सबक नहीं लेता वह बेहतर भविष्य को लेकर सतर्क नहीं रह सकता इसलिए विंध्यप्रदेश का आदि और अंत जानना जरूरी है। 


विंध्यप्रदेश की हत्याकथा में जब भी पं.नेहरू की भूमिका का कोई भी जिक्र होता है तो उन्हें भारतीय लोकतंत्र का आदि देवता मानने वाले लोग बिना जाने समझे टूट पड़ते हैं। कुछ महीने पहले ऐसे ही किसी संदर्भ में यह लिख दिया कि शैशव काल में ही एक प्रदेश की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उसके सबसे पिछड़े क्षेत्र ने पंडित नेहरू और उनकी काँग्रेस पार्टी को पूरी तरह खारिज कर दिया था। 


यह मसला अत्यंत पिछड़े सीधी(सिंगरौली सम्मिलित) जिले का था, जहाँ की जनता ने देश के पहले आम चुनाव यानी 1952 में पंडित नेहरू के तिलस्म को खारिज करते हुए उनकी महान कांग्रेस पार्टी को डस्टबिन में डाल दिया। सीधी की सभी विधानसभा सीटों और लोकसभा सीट में काँग्रेस सोशलिस्टों से पिट गई थी।


 यह संदर्भ लिखे जाने के बाद बहुत प्रतिक्रियाएं आईं रही हैं। कोई संदर्भ स्त्रोत जानना चाहता था तो कुछ लाँछन, तंज और गाली की भाषा तक उतर गए। खैर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भोगने का सभी को बराबर का अधिकार है..इस पर कुछ नहीं कहना..। 


कहते हैं एक तिनगी भी तोप दागने के लिए पर्याप्त होती है। विंध्यप्रदेश के पुनरोदय को लेकर विंध्य से भोपाल-दिल्ली तक कई छोटे-छोटे समूह सक्रिय हैं। वे सभी यह सपना सजोये बैठे हैं कि उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना जैसे छोटे राज्यों के उदय के बाद विंध्यप्रदेश के पुनरोदय का रास्ता स्वाभाविक रूप से खुल जाता है। विंध्यप्रदेश का जब विलोपन हुआ था तब कहा गया था कि छोटे राज्य सर्वाइव नहीं कर सकते। यह त्थोरी अब उलट गई है। 


उदित हुए नए राज्य कभी अस्तित्व में भी नहीं थे जबकि विंध्यप्रदेश एक भरापूरा प्रदेश रहा है पूरे आठ साल। विंध्य की अलख जगाने वाले ये बेचारे वीरव्रती इस क्षेत्र के सभी अलंबरदार नेताओं से गुहार-जुहार लगा-लगाके थक चुके हैं, नेताओं को फिलहाल यह मुद्दा वोट मटेरियल नहीं लगता। 


अपन लिख सकते हैं सो हर साल इस दिन अपने उस अबोध प्रदेश की हत्याकथा को याद कर शोक मना लेते हैं। हर साल इस दिन अपनी माटी के स्वाभिमान से जुड़ी टीसने वाली बात अवचेतन से  मावाद की तरह फूटकर रिसने लगती है। हर साल ही आक्रोश शब्दों में जाहिर होता हुआ व्यक्त हो ही जाता है।


यह आक्रोश हर उस आहत विंध्यवासी का है जो अक्सर यह कल्पना करता है कि आज विन्धप्रदेश होता तो तरक्की के किस मुकाम पर खड़ा रहता। क्या अपने रीवा की हैसियत भी भोपाल, लखनऊ, पटना, चंडीगढ जैसे नहीं होती..!


विंध्यप्रदेश अपने संसाधनों के बल पर देश के श्रेष्ठ राज्यों में से एक होता...लेकिन उसे आठ साल के शैशवकाल में सजा-ए-मौत दे दी गई। यह एक बार नहीं हजार बार कहूंगा, कहता रहूँगा। क्योंकि नई पीढ़ी को इस त्रासदी का सच जानना जरूरी है। 


जिनको इतिहास से बवास्ता होना है वे पहले वीपी मेनन की पुस्तक unification of indian states पढ़ ले तो पता चलेगा कि कितनी मशक्कत के बाद विंध्यप्रदेश बना था। जान लें, मेनन साहब सरदार पटेल के सचिव थे।


सन् 48 से 52 तक विंध्यप्रदेश को बचाए रखने की लड़ाई भी जान लें। लाठी-गोली खाएंगे धारा सभा बनाएंगे.. के नारे के साथ आंदोलन हुआ और अजीज, गंगा, चिंताली शहीद हुए। ये मरने वाले कोई भी पालटीशियन नहीं सरल-सहज-विंध्यवासी थे। 


तीन मासूमों का लहू रंग लाया और केंद्र शासित होने की बजाय विंध्यप्रदेश एक पूर्णराज्य के तौर पर बच गया। सन् 52 के चुनाव में देश में चल रही नेहरू की प्रचंड आँधी यहां आकर बवंडर मात्र रह गई। विंध्य से उस समय नेहरू को चुनौती दे रहे डा. लोहिया के युवातुर्क चेले बड़ी संख्या में जीतकर विधानसभा पहुंचे।


सीधी जैसे अत्यंत पिछड़े जिले में लोकसभा और सभी विधानसभा सीटों में सोशलिस्ट(एक में जनसंघ) जीते।  पं.नेहरू जी की प्रतिष्ठा के लिए तब यह बड़ा आघात माना गया। बीबीसी, रायटर, एपी जैसे न्यूजएजेंसियों ने दुनिया भर में ये खबरें प्रसारित कीं कि भारत के एक अत्यंन्त पिछड़े इलाके के मतदाताओं ने नेहरू और उनकी काँग्रेस को खारिज कर दिया। तब रीवा में प्रायः सभी बड़े अखबारों व एजेंसियों के पूर्णकालिक दफ्तर थे। 


नेहरू के खिलाफ यदि कहीं से खबरें जनरेट होतीं तो वह रीवा था क्योंकि तब वह जेपी, लोहिया, नरेन्द्र देव, कृपलानी का राजनीतिक शिविर बन चुका था। जो इतिहास जानते हैं उन्हें बताने की जरूरत नहीं कि यही चारों उस वक्त नेहरू के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी थे। कांग्रेस में भी जबतक थे इन्हें नेहरू जी के समकक्ष ही माना जाता था।


सन् 52 से लेकर 57 के बीच यहां समाजवादी आंदोलन पूरे उफान पर था। जन-जन की जुबान पर समाजवाद चढ़ा हुआ था। विधानसभा में सोपा के मेधावी विधायकों के आगे सत्तापक्ष की बोलती बंद थी। इसी विधानसभा में श्रीनिवास तिवारी का जमींदारी उन्मूलन के खिलाफ ऐतिहासिक सात घंटे का भाषण हुआ था जिसने लोकसभा में कृष्ण मेनन के भाषण के रेकार्ड की बराबरी की थी। भारतीय संसदीय इतिहास में यहीं पहली बार ..आफिस आफ प्राफिट.. के सवाल पर बहस हुई। समाजवादी युवा तुर्कों ने सत्ता की धुर्रियां बिखेर दी।


57 नजदीक आने के साथ ही योजना बनी कि विंध्यप्रदेश का विलय कर दिया जाए। यह रणनीति नेहरूजी की प्रतिष्ठा को ध्यान पर रखकर बनी कि न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।


56 में state reorganization commission गठित हुआ। दावे आपत्ति मगाए गए। विंध्यप्रदेश के योजना अधिकारी गोपाल प्रसाद खरे ने प्रदेश की आर्थिक क्षमता के आँकड़े तैयार किए। साक्षरता, प्राकृतिक संसाधनों पर भी एक रिपोर्ट तैयार कर आयोग के सामने यह साबित करने की कोशिश की गई कि विंध्यप्रदेश की क्षमता शेष मध्यप्रदेश से बेहतर है। यह रिपोर्ट विद्यानिवास मिश्र संपादित पत्रिका विंध्यभूमि में भी छपी। विद्यानिवास जी तब विंध्यप्रदेश के सूचनाधिकारी थे।


विडम्बना देखिए, समूचे विंध्यप्रदेश का प्रशासन, उसके अधिकारी यह चाहते थे कि इस प्रदेश की अकाल मौत न हो। इस बात की तस्दीक म.प्र. के मुख्य सचिव व बाद में भोपाल सांसद रहे सुशील चंद्र वर्मा ने हिंदुस्तान टाइम्स में छपे एक लेख के जरिये की। श्री वर्मा विंध्यप्रदेश में प्रोबेशनरी अधिकारी रह चुके थे। 


जब छत्तीसगढ़ बना तो उनकी तीखी प्रतिक्रिया थी- यदि कोई नया राज्य बनता है तो पहला हक विंध्यप्रदेश का है। जबकि तब श्री वर्मा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे, और छग अटलजी की सरपरस्ती में बना।


चूंकि नेहरूजी की प्रतिष्ठा कायम करने के लिए बाँसुरी के सर्वनाश हेतु बाँस को ही जड़ से उखाड़ने का फैसला लिया जा चुका था इसलिए न तो सरकार की आर्थिक क्षमता का सर्वेक्षण देखा गया और न ही विंध्यवासियों की आवाज़ सुनी गई। तत्कालीन काँग्रेसियों के सामने तो खैर नेहरू के आगे नतमस्तक रहने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। 


विधानसभा में  सोपा के विधायकों ने मोर्चा खोला। सभी नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट थे फिर भी ये सभी छुपते छुपाते विधानसभा पहुंचे मर्जर के खिलाफ श्रीनिवास तिवारी जी ने फिर छह घंटे का भाषण दिया। बाहर पुलिस हथकड़ी लिए खड़ी थी।


 विधानसभा सभा को छात्रों ने चारों ओर से घेर लिया। रामदयाल शुक्ल(जो बाद में हाईकोर्ट के जस्टिस बने) और ऋषभदेव सिंह(जो संयुक्त कलेक्टर पद से रिटायर हुए) के नेतृत्व में छात्रों ने विधानसभा के फाटक तोड़ दिए व सदन में घुसकर विंध्यप्रदेश के विलय का समर्थन करने वाले सभी मंत्री- विधायकों की जमकर धुनाई की। मुख्यमंत्री व स्पीकर ही बमुश्किल बच पाए।


सभी छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। यह आंदोलन भी कुचल दिया गया। गैर कांग्रेस सरकारों पर पंडित नेहरू का नजला गिरना शुरू हो चुका था। इसी क्रम में बाद में केरल की निर्वाचित साम्यवादी सरकार को बर्खास्त किया गया। लाठी और संगीनों के साए में विंध्यप्रदेश को सजा-ए-मौत सुनाई जा चुकी थी।


 अब भला बताइए एक मासूम राज्य के खून के छीटे से किसका कुरता रंगा हुआ है..? इतिहास के क्रूर सच को सुनने की भी आदत डालनी होगी। 


मैं भी उन वीरव्रतियों के संकल्प के साथ हूँ जो आज भी यह सपना सँजोए बैठे हैं कि एक दिन यह अँधेरा छँटेगा, सुबह होगी और प्राची से विंध्यप्रदेश का पुनरोदय होकर रहेगा।



- जयराम शुक्ल जी

विंध्यप्रदेश का मध्यप्रदेश में कैसे हुआ विलय, जो पूर्व में सोनभद्र से लेकर पश्चिम में दतिया तक फैला था विंध्यप्रदेश,जाने पूरा इतिहास।

 विंध्यप्रदेश का मध्यप्रदेश में कैसे हुआ विलय, जो पूर्व में सोनभद्र से लेकर पश्चिम में दतिया तक फैला था विंध्यप्रदेश, जाने पूरा इतिहास।







विंध्य प्रदेश का कैसे हुआ मध्यप्रदेश में विलय, यहां जानें पूरा इतिहास, रीवा को उपराजधानी की तरह सुविधाएं देने का किया गया था वादा, नेहरू का वादा भी भूल गई राज्य सरकारे, शर्तों के अनुसार नहीं मिले संसाधन, यह पश्चिम में दतिया, पूर्व मेें सोनभद्र, उत्तर में प्रयागराज, दक्षिण मेें बिलासपुर क्षेत्र तक फैला था।




 मध्यप्रदेश का गठन एक नवंबर 1956 को हुआ था, उसके पहले विंध्य प्रदेश का अपना अस्तित्व था। आज हम उसी विंध्य प्रदेश के इतिहास की बात करते हैै। विंध्य प्रदेश, भारत का एक भूतपूर्व प्रदेश था जिसका क्षेत्रफल 23,603 वर्ग किमी. तक फैला था। भारत की स्वतन्त्रता के बाद सेन्ट्रल इण्डिया एजेन्सी के पूर्वी भाग के रियासतों को मिलाकर 1948 में इस राज्य का निर्माण किया गया था। इस राज्य की राजधानी रीवा थी। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश एवं दक्षिण में मध्य प्रदेश था। विंध्य क्षेत्र पारंपरिक रूप से विंध्याचल पर्वत के आसपास का पठारी भाग को कहा जाता है। 1948 में भारत की स्वतंत्रता के बाद मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश,छत्तीसगढ़ में स्थित कुछ रियासतों को मिलाकर विंध्यप्रदेश की रचना की गई थी। इसमें भूतपूर्व रीवा रियासत का एक बड़ा हिस्सा, बघेलखंड, बुंदेलखंड आदि थे। इसकी राजधानी रीवा थी।

इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में मध्य प्रदेश के दतिया तक फैला हुआ था। 1 नवम्बर 1956 को ये सब मिलाकर मध्यप्रदेश बना दिए गए थे। यह क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा जाता है। सतना, रीवा विंध्य प्रदेश के बड़े नगर है। यह पश्चिम में दतिया, पूर्व मेें सोनभद्र, उत्तर में प्रयागराज, दक्षिण मेें बिलासपुर क्षेत्र तक फैला था। विंध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं॰ शंभुनाथ शुक्ल जी थे, जो शहडोल के रहने वाले थे। उनके नाम पर शहडोल में बड़ा शासकीय विश्वविद्यालय है और रीवा विश्वविद्यालय का सांस्कृतिक हाल भी उन्हीं के नाम पर है। राजधानी भोपाल स्थित मंत्रालय में भी पं॰ शंभुनाथ शुक्ल के नाम पर कई कक्ष स्थापित है।



चार साल तक रहा विंध्य प्रदेश का अस्तित्व

आजादी के बाद रीवा स्टेट विंध्य प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आया। एक ऐसा प्रदेश जो प्राकृतिक और ऐतिहासिक संपदाओं से परिपूर्ण था। 1952 में पहली बार विंध्य प्रदेश की विस का गठन किया गया। चार साल तक अस्तित्व में रहे इस प्रदेश के विलय का फरमान भी सरकार ने जारी कर दिया। स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हुआ, आंदोलन छेड़े गए। यह पहला अवसर था जब युवाओं और छात्रों के हाथ में आंदोलन की कमान थी। पुलिस की गोलियों से गंगा, चिंताली नाम के दो आंदोलनकारी शहीद हुए। दर्जनों की संख्या में लोग जख्मी हुए।


राज्य स्तर के कार्यालय दिए जाएंगे: नेहरू

बढ़ते विरोध के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा कि एकीकृत मध्यप्रदेश में शामिल हो रहे राज्यों को मजबूती दी जाएगी, उन्हें राज्य स्तर के कार्यालय दिए जाएंगे। उस दौर को देखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम सिंह बताते हैं कि विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शंभूनाथ शुक्ला और केन्द्र सरकार के बीच कुछ शर्तों को लेकर समझौते हुए थे। शर्तों बारे में मांग भी उस दौरान उठी कि सार्वजनिक किया जाए पर ऐसा नहीं हुआ।



यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार

भाषणों में आश्वासन दिया गया था कि विंध्य प्रदेश को संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। एक नवंबर 1956 को विंध्यप्रदेश के विलय के साथ नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया। जिन क्षेत्रों को इसमें शामिल किया गया, उसमें भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर आदि को विकसित करने बड़ी योजनाएं दी गईं। तब से लेकर अब तक लगातार यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार होता रहा है। इसे केवल सुदूर जिले की भांति समझा गया। अब भी सबसे अधिक राजस्व यहीं से जा रहा है। उस समय सिंगरौली, शहडोल से दतिया तक का हिस्सा विंध्य प्रदेश में शामिल था।




राज्य स्तर के ये कार्यालय भी चले गए

विंध्यप्रदेश के विलय के बाद रीवा में वन, कृषि एवं पशु चिकित्सा के संचालनालय खोले गए। पूर्व में यहां हाईकोर्ट, राजस्व मंडल, एकाउंटेंट जनरल ऑफिस भी था। धीरे-धीरे इनका स्थानांतरण होता गया। उस दौरान भी यही समझाया गया कि विकास रुकेगा नहीं, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। इसी तरह ग्वालियर में हाईकोर्ट की बेंच, राजस्व मंडल, आबकारी, परिवहन, एकाउंटेंट जनरल आदि के प्रदेश स्तरीय कार्यालय खोले गए। इंदौर को लोकसेवा आयोग, वाणिज्यकर, हाईकोर्ट की बेंच, श्रम विभाग आदि के मुख्यालय मिले। जबलपुर को हाईकोर्ट, रोजगार संचालनालय मिला था। रीवा के अलावा अन्य स्थानों पर राज्य स्तर के कार्यालय अब भी संचालित हैं, लेकिन यहां की उपेक्षा लगातार होती रही।



-✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी, संचालक ब्लॉग

Vindhya Pradesh The Land Of White Tiger





Saturday, October 31, 2020

विंध्यवासियों को विंध्यप्रदेश राज्य वापस किया जाये

 विंध्यवासियों को विंध्यप्रदेश राज्य वापस किया जाये 



********************************************

आज के दिन ही 1 नवंबर 1956 को विंध्यप्रदेश राज्य का विलीनीकरण मध्यप्रदेश मे कर विंध्यवासियों के साथ कुठाराघात किया गया था । विंध्यभारती परिषद् के संयोजक हरिहर प्रसाद तिवारी ने कहा कि विंध्यप्रदेश विंध्य वासियों का है।

  विंध्यप्रदेश राज्य की वापसी विंध्यवासियों का नैतिक अधिकार है । देश की आजादी के बाद लगभग 4 वर्षों तक विंध्य प्रदेश राज्य अस्तित्व में रहा ,और उस दौरान विंध्य के विकास की आधारशिला रखी गयी ,परंतु राजनैतिक षडयंत्रों के तहत अकारण विंध्य प्रदेश राज्य का विलय 1-11-1956 को मध्यप्रदेश राज्य में कर दिया गया । इस विलीनीकरण के दुष्परिणाम और अपमान का दंश विंध्य वासी लगभग 65वर्षों से झेल रहे हैं।  विंध्य प्रदेश राज्य वापसी के लिए  मार्च 2000 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होकर केन्द्र सरकार को भेजा गया था , लेकिन उक्त प्रस्ताव को राजनैतिक द्वेश भावना के कारण  संभवतः कूड़ेदान में फेंक दिया गया। जबकि छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना जैसे राज्य पूर्णतः अस्तित्व में आ गये और विकास कार्यो को उंचाइयों तक पहुँचा रहे हैं। 

          हम विंध्यवासियों का विंध्य प्रदेश हमसे छीन लिया गया और हम दूसरे का मुंह निहारते उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। जबकि विंध्य क्षेत्रफल के दृष्टि से बृहद, राजस्व प्राप्ति के मामले में समृद्ध, प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संसाधानो का विपुल भंडार है। पर्याप्त उद्योग धंधे है, शिक्षा के समुचित विस्तार के अवसर है। विंध्य के आय से मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्र में विकास कार्य हो रहे हैं, जबकि विंध्यांचल के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है, जिसके कारण विंध्य क्षेत्र विकास के मामले अपेक्षाकृत बहुत पीछे है। 

     

                   आदरणीय हरिहर प्रसाद तिवारी जी


    

विंध्य भारती परिषद् के संयोजक हरिहर प्रसाद तिवारी ने कहा कि  विंध्यप्रदेश का विलय मध्यप्रदेश मे करना विंध्यवासियों के साथ घोर अन्याय था,अब यह अन्याय विंध्य वासी और बर्दास्त नही करेंगे , विंध्यभारती परिषद् के संयोजक हरिहर तिवारी ने कहा कि विंध्यप्रदेश वापसी के लिये हस्ताक्षर अभियान विग वर्ष 2018 से चलाया जा रहा है, अब तक रीवा,सतना सीधी अनूपपुर, शहडोल जिले के लगभग एक लाख लोगों के हस्ताक्षर प्राप्त हो चुके हैं अभी यह जागरूकता अभियान निरंतर गति पर है ।हरिहर प्रसाद तिवारी ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि अब विंध्यांचल को मध्यप्रदेश से पृथक कर मार्च 2000 में पारित विधानसभा प्रस्ताव पर समुचित निर्णय ले तथा  विंध्यप्रदेश राज्य विंध्यवासियों को वापस करें ।


 विंध्य प्रदेश राज्य, विंध्यवासियों की सशक्त आवाज है। खास वजह है कि विंध्यप्रदेश राज्य के बिलीनीकरण के 65 साल हो गये आज भी सबसे अधिक गरीबी,भुखमरी और कुपोषण पूर्व विन्ध्य प्रदेश क्षेत्र में है।सबसे अधिक पलायन भी विन्ध्यांचल से ही है, विन्ध्य के अधिकांशं इलाके में सिंचाई और पीने के पानी का संकट है।मध्यप्रदेश में  मध्य भारत, महाकौशल, भोपाल और तत्कालीन  विन्ध्य प्रदेश का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो सबसे अविकसित क्षेत्र विन्ध्य प्रदेश ही है।यह मांग राजनीतिक नहीं है।इस क्षेत्र का विकास बिना राज्य बने संभव ही नहीं है।



-पंडित पंकज द्विवेदी , संचालक ब्लॉग

Vindhya pradesh the land of white tiger

Saturday, October 24, 2020

माँ बिरासिनी देवी की जो मन से भक्ति करता है उसकी मनोकामना मईया पूरी करती है




10वी शताब्दी में कलचुरी काल के राजा वीर सिंह ने मंदिर का निर्माण किया था। विंध्य क्षेत्र के उमरिया जिले में स्थित बिरसिंहपुर पाली में माँ बिरासिनी देवी का भव्य मंदिर स्थापित है।


नवरात्रि के पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा हुआ है। माँ की भव्य आरती देख सुन कर ही चित्त में आत्म शुद्धि का अनुभव होता है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से मां की भक्ति करता है उसकी मनोकामना मैय्या पूरी करती हैं। माँ अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं।

बिरासिनी माता मंदिर बीरसिंहपुर  पाली | birasini mata mandir birsinghpur pali-

बिरासिनी मंदिर में आदिशक्ति स्वरूपा बिरासिनी माता की  10 वीं सदी की  कल्चुरी कालीन काले पत्थर से निर्मित भव्य मूर्ति विराजमान है | यह  पूरे भारत में  माता  काली की उन गिनी चुनी प्रतिमाओं में से एक है । मंदिर के गर्भ गृह में माता के  पास ही भगवान् हरिहर बिराजमान हैं जो आधे  भगवान्  शिव और आधे  भगवान्   विष्णु के रूप हैं | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं | मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण , मरही माता, भगवान् जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं | मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित  है |माता की  अलौकिक शक्तियों के कारण लोगों की मनोकामनाएं हमेशा पूरी होती हैं और यहां साल भर लोगों की भीड़ रहती है |

                                 


बिरासिनी माता मन्दिर से जुडी मान्यता -

मान्यतानुसार बिरासिनी माता ने सैंकड़ों वर्ष पूर्व पाली निवासी धौकल नामक व्यक्ति को सपना दिया कि उनकी मूर्ति एक खेत में है जिसे लाकर नगर में स्थापित करो | धौकल नामक व्यक्ति ने मूर्ति लाकर एक छोटी सी मढिया बनाकर माता को बिराजमान कराया | बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने एक मंदिर का निर्माण कराकर माता की स्थापना की | 



बिरासिनी माता  मंदिर का पुनर्निर्माण | Rebuilding Of Birasini Mata Temple -

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण का प्रारंभ जगतगुरु शंकराचार्य द्वारका  शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द  सरस्वती जी के पावन करकमलों द्वारा माघ शीर्ष कृष्ण पक्ष गुरुवार विक्रम संवत २०४६ ( दिनांक 23 नवम्बर 1989 ) को किया गया और बीरसिंहपुर कालरी /SECL/सभी दानदाताओं के सहयोग से लगभग सत्ताईस लाख रूपये में माता के संगमरमर के भव्य मंदिर पूर्ण हुआ | मंदिर का वास्तुचित्र , वास्तुकार श्री विनायक हरिदास NBCC नई दिल्ली द्वारा निशुल्क प्रदान किया गया |  बिरासिनी माता देवी मंदिर का जीर्णोद्धार का समापन कार्यक्रम , पुनः प्राण प्रतिष्ठा, कलश शिखर प्रतिष्ठा गुरूवार वैशाख शुक्र सप्तमी संवत् २०५६ (22 अप्रेल 1999 ) जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष से संपन्न हुआ |

माता बिरासिनी देवी के मंदिर परिसर में दो मुख्य प्रवेश द्वार है और एक द्वार पीछे के तरफ है | मंदिर पूरी तरह संगमरमर से निर्मित है | मंदिर के गर्भ गृह में माता बिरसिनी (काली माता)  बिराजमान हैं  | मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर भी हैं | मंदिर के बाजू में मुंडन स्थल है | मुंडन स्थल के सामने ज्योति कलश स्थल है जो एक विशाल तलघर रूपी हाल है जिसमें नवरात्र में लोगों द्वारा हजारों घी और तेल के ज्योति कलशों की स्थापना की जाती है | मंदिर परिसर  में ही मंदिर का समिति  कार्यालय , छोटी धर्मशाला  और भण्डारा स्थल है |



नवरात्र और जवारा विसर्जन 

बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के  मंदिर में वर्ष में दो बार शारदेय और चैत्र  में नवरात्र पूजा बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है | जिसमें ना केवल आस-पास के लोग अपितु देश-विदेश  से लोग अपनी मनोकामनायें मांगने के लिए आते हैं और मनोकामनायें पूरी होने पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं | नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है | यहां हजारों कि संख्या में घी,तेल और जवारे के कलश स्थापित किये जाते हैं | ज्योति कलश हेतु एक विशाल हाल की व्यवस्था है | जवारे हेतु दो मंजिला व्यवस्था की जाती है | श्रध्दालुओं द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने हेतु मंदिर प्रबंध संचालन समिति द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था की जाती है जिसमेंकोई भी व्यक्ति निश्चित राशि जमा करके घी जवारे कलश, तेल जवारे कलश , मनोकामना कलश,आजीवन घी जवारे कलश ,आजीवन तेल जवारे कलश स्थापित कर सकते हैं  | पूरे नवरात्र में मंदिर परिसर में बच्चो के मुंडन , कर्ण छेदन की व्यवस्था की जाती है | सांथ ही मंदिर समिति और अन्य लोगों द्वारा भण्डारे भी करवाये जाते हैं  और पुरे नौ दिन माता का श्रृंगार , भोग ,पूजा अर्चना बड़े ही श्रध्दा भक्ति से की जाती है | माता बिरासिनी के दरवार सोने-चांदी  के जेवरात सहित लाखो का चढ़ावा चढ़ाया जाता है |

बिरासिनी माता के जवारे विसर्जन बहुत ही प्रसिद्ध है जिसमें हजारों के संख्या  में महिला/पुरुष  जवारे विसर्जन में सम्मिलित होते हैं |


2 मंजिल में बोई जाती है ज्वार

जवारों और प्राचीन प्रतिमा को लेकर प्रसिद्ध इस मां बिरासिनी मंदिर में इस बार २७ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा सकते हैं। दो मंजिला में जवारों को बोया जाता है। अभी एक मंजिला पूरा जवारों से भर गया है।दूसरे मंजिल में भी जवारे बोने शुरू किया जाएगा। माता बिरासिनी के दरबार मे श्रद्धालुओ द्वारा मनोकामना कलश स्थापित करने के लिए मन्दिर प्रबन्ध संचालन समिति के द्वारा बेहतर व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही मंदिर परिसर में जवारे बोना शुरू कर दिया गया है। भक्तिमय माहौल के बीच जवारों का विसर्जन किया जाता है। इस साल भी १५ हजार से ज्यादा जवारे बोए जा रहे हैं।


बीरसिंहपुर पाली कैसे पहुंचें | How to Reach Birsinghpur Pali - 

रेल मार्ग -   बीरसिंहपुर पाली बिलासपुर – कटनी ट्रेन रूट पर स्थित है | बीरसिंहपुर पाली स्टेशन से बिरसिनी माता मंदिर की दूरी 1/2 (आधा) किलोमीटर है |

सड़क मार्ग-  बीरसिंहपुर पाली  की सड़क मार्ग से जिला मुख्यालय उमरिया से दूरी- 40 किमी० ,शहडोल से दूरी- 38 किमी० ,नौरोजाबाद से -9 किमी० , डिन्डोरी से 77 किमी० , जबलपुर से 150 किमी० , अमरकंटक और बांधवगढ़ से दूरी क्रमशः 70 किमी० और 144 किमी० है | 

वायु मार्ग- निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर 150 किलोमीटर है |

#विंध्यप्रदेश , #विंध्य , #बिरासिनीमन्दिर 


-✍️✍️ पंडित पंकज द्विवेदी, संचालक ब्लॉग
VINDHYA PRADESH THE LAND OF WHITE TIGER

Tuesday, October 20, 2020

जलजलिया माँ भक्तों की करती है मनोकामना पूरी ,पहाड़ से हुई थी प्रकट




जलजलिया माँ

सिंगरौली के माड़ा में मौजूद है देवी मंदिर, आदिमानव काल से जुड़ा है इतिहास। श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि मध्य प्रदेश के सिंगरौली में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं पर माड़ा की जलजलिया मां की बात ही निराली है।


 श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि मध्य प्रदेश के सिंगरौली में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं पर माड़ा की जलजलिया मां की बात ही निराली है। कहते हैं मां जलजलिया पहाड़ से प्रकट हुई हैं और हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं। इस स्थान को आदि मानवकाल से जोड़कर भी देखा जाता है। सिंगरौली रेलवे स्टेशन से करीब 60 किमी. पर स्थान है।


ऊंचे पहाड़ों हरे-भरे जंगलों से आच्छादित यह स्थान बड़ा ही रमणीय है। माड़ा की आदिमानव काल की गुफाओं की श्रृंखला के बीच मां जलजलिया का मंदिर है। पुजारी बताते हैं मां जलजलिया पहाड़ तोड़कर अवतरित हुई हैं।


निर्मल धारा सदा प्रवाहित

विशाल पहाड़ के नीचे से जल की अविरल निर्मल धारा सदा प्रवाहित होती है। इस जलधारा के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ के नीचे क्षीर सागर है जहां से यह जलधारा आती है। सदियों पहले देवी की मूर्ति स्थापित कर मां जलजलिया के नाम से लोग उपासना करने लगे। धीरे-धीरे मां की कृपा से लोगों के दुख दर्द दूर हुए और यहां आस्था का मेला लगने लगा।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger


पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं

यहां देशभर से श्रृद्धालू मां के दर्शन के लिए आते हैं। मन्नतें रखते हैं। मां को चुनरी भेंट करते हैं। नारियल रेवड़ी का प्रसाद चढ़ाते हैं। माथा टेक मां से आशीर्वाद लेते हैं। इस स्थान को आदिमानव काल से जोड़ कर देखा जाता है। इसकी वजह माड़ा की गुफाएं हैं। जो आदिमानव काल की हैं। पहाड़ों को काटकर बनाई गई हैं। इन्हीं गुफाओं की श्रृंखला के बीच यह देवी स्थान हैं।


पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही रमणीय स्थल

उसी पहाड़ में है जिसमें माड़ा की 'रावण' गुफा है। इस स्थान की खूबी यह है कि धार्मिक केंद्र तो है ही, पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत रमणीय स्थल है। यहां चहुंओर घनघोर जंगल है। पक्षियों का कलरव सुन आनंद की अनुभूति होती है तो सदानीरा झरने देख मन शीतल हो जाता है। हरी-भरी वादियों के बीच शांति और सुकून मिलता है। इस स्थान तक पहुंचने के लिए बस और आटो मुख्य साधन हैं। बैढऩ बस अड्डे से माड़ा तक बसें चलती हैं तो सिंगरौली रेलवे स्टेशन और बस अड्डे से आटो कर भी जाया जा सकता है।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger




शेषनाग करते हैं यहां शिव का जलाभिषेक

वाकई अद्भुत दृश्य है यहां। मां जलजलिया के स्थान से कुछ ही कदम पर शिवलिंग स्थापित है। जिनके ऊपर शेषनाग के फन से जलधारा निरंतर गिरती रहती है अर्थात शेषनाग भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह जलधारा मां जलजलिया के स्थान से निकलकर शेषनाग के शरीर में प्रवेश करती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई पीढिय़ों से सुनते हैं कि यह जलधारा कभी रुकी नहीं। यह चमत्कार सदियों से बरकरार है।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger


मकर संक्रांति को जुटता है आस्था का सैलाब

यूं तो हर रोज श्रद्धालू यहां पहुंचते हैं लेकिन मकर संक्रांति को यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालू आते हैं। पुजारी पं. रामानुह बताते है कि इस दिन आस्था चरम पर होती है। यह दिन मां जलजलिया का विशेष दिन है। हवन, यज्ञ, अनुष्ठान और कई तरह के संस्कार यहां पर संपन्न कराए जाते हैं। इसके अलावा श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भी श्रद्धालू पूजन-अर्चन करते है। महिलाएं इस दिन अधिक संख्या में पहुंचती हैं। सावन में भी श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

©vindhyapradeshthelandofwhitetiger


छत्तीसगढ़ में मां के अपार भक्त

मां जलजलिया जिस स्थान पर विराजीं हैं वहां से छत्तीसगढ़ की सीमा महज कुछ किमी. दूर है। पहाड़ पार करते ही मध्य प्रदेश की सीमा समाप्त और छत्तीसगढ़ की सीमा शुरू हो जाती है। इसलिए छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती गांवों मेंं मां के अपार भक्त हैं। मां की महिमा का गुणगान वहंा खूब होता है।

-✍️✍️पंडित पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

Thursday, June 11, 2020

बांधवगढ़ राट्रीय उद्यान 15 जून से खुलेगा लेकिन इस कोरोना महामारी में सावधानी और सुरक्षा के साथ जाए

Bandhavgarh national park 

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान  15 जून से खुलेगा



कोरोना महामारी के चलते 20 मार्च 2020 से बंद बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व का कोर जोन 15 से 30 जून तक पर्यटकों के लिये वापस खुलने जा रहा है। वर्षा ऋतु के दौरान पर्यटक बफर जोन में भ्रमण कर सकेंगे। रिजर्व के क्षेत्र संचालक श्री विंसेंट रहीम की अध्यक्षता में हुई बैठक में उक्त निर्णय लिया जाकर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की एडवाईजरी और गाइडलाईन पर विस्तृत चर्चा की गई।

शासन को भेजा प्रस्ताव

बैठक में हुई चर्चानुसार बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व को खोलने संबंधी तय किये गये दिशा-निर्देशों का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, जिसमेंपर्यटकों को प्रवेश गाइडलाइन के आधार पर ही मिलेगा। 10 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक आयु के पर्यटकों को प्रवेश नहीं दिया जायेगा। आई.डी. कार्ड दूर से दिखाना होगा। 6 पर्यटक एक ही परिवार से हैं तो उन्हें एक ही जिप्सी में प्रवेश दिया जायेगा। अगर एक परिवार से नहीं हैं तो एक जिप्सी वाहन में 4 पर्यटक भ्रमण करेंगे। सभी पर्यटक मास्क, सेनीटाइजर और दो गज दूरी के नियम का पालन करेंगे। कोई पर्यटक पार्क के अन्दर गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकेगा। सेन्टर पॉइंट पर खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं होगी। जिप्सी वाहन में प्रवेश और वापस आने पर वाहन मालिक को स्वयं ही सेनीटाइज कराना होगा।


होटल मालिक पार्क जाने से पूर्व पर्यटकों की थर्मल स्क्रीनिंग करेंगे। साथ ही पर्यटन गेट पर भी पुन: थर्मल स्क्रीनिंग होगी। प्रवेश द्वार को रोज तीन बार सेनीटाइज किया जायेगा। पर्यटकों के सम्पर्क में आने वाले जिप्सी चालक और गाइड मास्क और सेनीटाइजर का उपयोग अनिवार्य रूप से करेंगे। कोरोना जैसे लक्षण दिखने पर पार्क में प्रवेश हरगिज नहीं दिया जायेगा और तत्काल जानकारी प्रशासन को दी जायेगी।

क्षेत्र संचालक ने बताया कि सभी जिप्सी वाहन में सीट कवर नहीं होगा। पार्क के अन्दर थूकना प्रतिबंधित रहेगा। पानी की बोटल और खाने-पीने की चीजें डस्टबिन में न डालकर वाहन के अन्दर रखना होगा। बैठक में उप संचालक श्री सिद्धार्थ गुप्ता, एसडीओ श्री अनिल शुक्ला, पर्यटन प्रभारी श्री बीनू गहरवार, गाइड यूनियन के अध्यक्ष श्री राजेश द्विवेदी, जिप्सी यूनियन के अध्यक्ष श्री रतिभान सिंह और होटल यूनियन के अध्यक्ष श्री ज्ञानेन्द्र तिवारी उपस्थित थे।

--✍️✍️ पंकज द्विवेदी संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

Friday, June 5, 2020

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम , इस कोरोना काल में घर में रहकर ही मनाए विश्व पर्यावरण दिवस


विश्व पर्यावरण दिवस 2020 (World Environment Day 2020) : 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) मनाया जाता है. विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने के पीछे उद्देश्य है पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना. पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया. विश्व पर्यावरण दिवस या वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे को आप प्राकृति मां के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का दिन कह सकते हैं. इस दिन को मनाने की बड़ी वजह यह है कि लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत किया जा सकते. मनुष्य भी तो पर्यावरण और पृथ्वी का एक हिस्सा ही हैं. प्रकृति के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं. तो चलि‍ए जानते हैं कहीं न कहीं मनुष्य के अस्तित्व से भी जुड़े इस खास दिन के बारे में. क्या है विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास, महत्व, क्यों मनाया जाता है इसे और क्या है विश्व पर्यावरण दिवस  2020 की थीम.
कब हुई विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत, क्या है विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास (World Environment Day History)

जैसा कि हम बता चुके हैं कि पहली बार सन 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 5 जून को इस दिवस की नींव रखी. उसके बाद से हर साल इसी दिन यानी 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. असल में सन 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पर्यावरण और प्रदूषण पर स्टॉकहोम (स्वीडन) में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया था. जिसमें तकरीबन 119 देशों ने हिस्सा लिया था. इसके बाद 5 जून को विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाया जाने लगा. जानते हैं क्या है विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम...

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम (World Environment Day 2020 Theme)

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस को एक थीम दी जाती है. विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम है 'प्रकृति के लिए समय' (Time for Nature). इसका मकसद पृथ्वी और मानव विकास पर जीवन का समर्थन करने वाले आवश्यक बुनियादी ढांचे को प्रदान करने पर ध्यान दिया जाए.
World Environment Day 2020: 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है.

कोरोनावायरस के दौरान कैसे मनाएं विश्व पर्यावरण दिवस (How to celebrate World Environment Day)

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर दुन‍िया भर के देश आधिकारिक समारोह आयोजित करते हैं. लेकिन इस साल के मेजबान जर्मनी के साथ साझेदारी में कोलंबिया है. इस साल, COVID-19 महामारी के प्रकोप के कारण लाखों लोग डिजिटल रूप से विश्व पर्यावरण दिवस मनाएंगे. भले ही मनुष्य को लॉकडाउन ने हिला कर रख दिया हो, लेकिन पर्यावरण पर लॅाकडाउन का साकारत्मक प्रभाव पड़ा है.
क्यों मनाते हैं विश्व पर्यावरण दिवस, इसे मनाने की वजह
जैसा क‍ि बीते कई सालों से हम देखते, सुनते और पढ़ते आ रहे हैं विश्व में पर्यावरण प्रदूषण की समस्‍या विकराल होती जा रही है. इंसानों ने अपनी सुविधाओं के लिए संसाधनों का निर्माण किया, जिससे पर्यावरण पर बुरा असर हुआ. इस बुरे असर से होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए वैश्विक मंच बनाया गया. विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की वजह है लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना.

प्लास्टिक का प्रयोग न करें -
आज के समय में प्लास्टिक सबसे अधिक पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है. प्लास्टिक की वजह से कितने ही जीव आज विलुप्त होने की कगार में है. समुद्री जीवों को भी प्लास्टिक ने बहुत अधिक नुकसान पहुँचाया है. कछुए, मछली, सीबर्ड और अन्य जीव जन्तुओं को इसका सामना करना पड़ रहा  है.


बारिश के पानी का संग्रह -
आज के समय में मनुष्यों के लिए सबसे बढ़ी समस्या पानी है. लगातार पानी की कमी हो रही है. कई देशों में तो पानी न के बराबर रह गया है. ऐसे में बारिश के पानी का संरक्षण करना चाहिए.


कोयले की जगह अन्य एनर्जी सोर्स से बिजली बनायें -
कोयले से बिजली बनाने में कार्बन डायऑक्साइड और निट्रस ऑक्साइड गैस प्रकृति में मिल जाती है. इस लिए हमें कोशिश करना चाहिए कि हम बिजली बनाने में सौर्य ऊर्जा, पवन चक्की और अन्य सोर्स की मदद लें.


अधिक से  अधिक पौधें लगाना -
पौधे प्रकृति के लिए  बहुत जरुरी है यह पर्यावरण की हवा को शुद्ध करने के साथ ही तापमान को भी स्थिर रखने में मदद करते हैं. साथ ही ओक्सीजन का सोर्स भी है. जिसके बिना मनुष्य जिन्दा नहीं रह सकता है.

--✍️✍️✍️ पंकज द्विवेदी  संचालक ब्लॉग
Vindhya pradesh the land of white tiger

रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम

👉#रीवा_एयरपोर्ट के निर्माण से विन्ध्य के विकास को मिलेगा नया आयाम 👉प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi बनारस से वर्चुअली करेंगे रीवा एयरपोर्ट ...